गुजरातः क्या शाकाहार का दबाव कुपोषण की एक वजह है


भारत में कुपोषण को लेकर सामने आए हालिया आंकड़े चौंकाने वाले हैं. दिसंबर 2019 तक अकेले गुजरात राज्य में कुपोषित बच्चों की संख्या में 2.41 लाख का इजाफा हुआ है. जुलाई 2019 तक ये आंकड़ा 1.42 लाख था. हालिया आंकड़े सामने आने के बाद अब गुजरात में कुपोषित बच्चों की संख्या 3.8 लाख हो गई है. गुजरात पोषण अभियान 2020-2022 और घरेलू राशन योजना जैसी तमाम मुहिम के बावजूद राज्य में कुपोषण की समस्या लगातार बढ़ रही है. हालिया आंकड़ों ने सरकार के उन दावों की धज्जियां उड़ा दी हैं जिनमें गुजरात को मॉडल स्टेट और संवेदनशील सरकार होने के दावे किए जा रहे थे. राज्य का बनासकांठा ज़िला कुपोषण के मामले में सबसे ऊपर है. जुलाई 2019 से दिसंबर 2019 के बीच यहां कुपोषित बच्चों की संख्या 22194 बढ़ी है. इसके साथ जिले में कुल कुपोषित बच्चों की संख्या बढ़कर 28265 हो गई है. इसके बाद आणंद में कुल कुपोषित बच्चों की संख्या अब बढ़कर 26021 हो गई है जो जुलाई 2019 में 19995 थी. आदिवासी बहुल ज़िले दोहड़ में 22613, पंचमहल में 20036 और वडोदरा में 20806 के अलावा दूसरे जिलों के आंकड़े भी हैरान करने वाले हैं. इनमें सेंट्रल गुजरात का ज़िला खेड़ा भी शामिल है जहां कुल कुपोषित बच्चों की संख्या 19269 हो गई है. विधानसभा में रखे गए आंकड़े गुजरात विधानसभा के बजट सत्र में गुरुवार को महिला एवं बाल विकास राज्य मंत्री विभावरी दवे ने आंकड़े पेश किए हैं. मंत्री ने आंकड़े तब जाहिर किए जब विपक्षी कांग्रेस पार्टी ने दावा किया कि राज्य में कुपोषित बच्चों की संख्या में तीन गुना इजाफ़ा हुआ है. देशभर में शून्य से छह साल की उम्र तक के बच्चों को पोषण आहार इंटीग्रेटेड चाइल्ड डेवलपमेंट स्कीम (ICDS) के तहत आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं के जरिए दिया जाता है. आंगनबाड़ी कार्यकर्ता वो पोषण आहार बच्चों तक पहुंचाने का काम करती हैं जो सरकार से उन तक पहुंचता है. योजना के मुताबिक, वितरण प्रक्रिया दो हिस्सों में बंटी है. शून्य से 3 साल की उम्र के बच्चों और उनकी माताओं के लिए सरकार घरेलू राशन योजना (THR) चलाती है. इसके तहत माताओं घर में भोजन पका कर बच्चों को खिला सकती हैं. दूसरी प्रक्रिया आंगनबाड़ी केंद्र की है. जहां बच्चे आकर कुछ घंटे बिताते हैं और उन्हें वहां खाना दिया जाता है. हालांकि बीते दो सालों से आंगनबाड़ी केंद्रों को सप्लाई होने वाले पोषक आहार में काफ़ी अंतर देखने को मिला है. बीबीसी से बातचीत में सेंट्रल गुजरात में काम करने वाली आंगनबाड़ी कार्यकर्ता वहीदा पडरी ने कहा कि घरेलू राशन योजना के तहत मिलने वाला स्टॉक अगस्त 2019 के बाद से नहीं आया. वहीदा पडरी कहती हैं, "ये राशन 0-3 साल की उम्र वाले बच्चों के घरों में पहुंचना ज़रूरी है. ये पोषक आहार मां और बच्चे दोनों के लिए हैं लेकिन जब स्टॉक हमारे पास नहीं आएगा तो गांव में कैसे बांटेंगे." बेहतर पोषण की श्रेणी सोनल लांबा बीते चार सालों से आंगनबाड़ी कार्यकर्ता हैं. आमतौर पर वो 10 बजे आंगनबाड़ी केंद्र पहुंच जाती हैं. वो केंद्र की सछाई करती हैं और बच्चे करीब साढ़े दस बजे वहां पहुंचते हैं. बच्चों को पहले साढ़े दस बचे खाना दिया जाता है. उसके बाद दोपहर साढ़े 12 बजे. इस दौरान वो बच्चों को प्री-स्कूल का सिलेबस भी पढ़ाती हैं.उनके केंद्र में आने वाले 92 बच्चों में से 62 बेहतर पोषण की श्रेणी (ग्रीन ग्रेड) में, 20 बच्चे कम पोषित (येलो ग्रेड) और 12 बच्चे कुपोषित (रेड ग्रेड) पाए गए हैं. वो कहती हैं कि सर्वे और दूसरे छील्ड वर्क की वजह से वो 12 कुपोषित बच्चों को सही वक़्त नहीं दे पायीं. उन्होंने कहा, "उन बच्चों को विशेष देखभाल और अच्छे भोजन की ज़रूरत है. लेकिन ना तो खाना है और ना ही विशेष ख्याल रखने का वक़्त है." लांबा कहती हैं कि स्टॉक सप्लाई लगातार अनियमित होती जा रही है जिससे आंगनबाड़ी बनाए जाने की मूल योजना पर ही प्रश्नचिन्ह लगते हैं. हालांकि बीबीसी ने जब गुजरात सरकार की महिला और बाल विकास कमिश्नक मनीषा चंद्रा से इस मामले में बात करने की कोशिश की तो उनकी ओर से कोई जवाब नहीं मिला. क्या शाकाहार का दबाव कुपोषण की एक वजह है? अधिकतर विशेषज्ञ इस बात से सहमत नज़र आते हैं कि शाकाहार पर ज़्यादा ज़ोर दिया जाना भी कुपोषण की एक बड़ी वजह है. बीबीसी से बातचीत में एक्टिविस्ट और अन्न सुरक्षा अधिकार अभियान की संयोजक नीता हरदीकार कहती हैं कि बहुत सी जनजातियों, समुदायों, जातियों के लोग शाकाहार के आदी नहीं हैं लेकिन उन्हें आंगनबाड़ी केंद्रों, मिड-डे मील जैसी योजनाओं में शाकाहारी खाना खाने के लिए मजबूर किया जा रहा है. जिससे इस प्रोजेक्ट पर बुरा असर पड़ रहा है. वो कहती हैं छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों को बेहतर परिणाम मिल रहे हैं जब से उन्होंने अपने प्रोजेक्ट में अंडा भी शामिल किया है. क्या जागरूकता की कमी भी वजह है? बाल अधिकार एक्टिविस्ट सुखदेव पटेल का मानना है कि राज्य में कुपोषण की शिकायत और इसे मॉनिटर किए जाने को लेकर कोई असरदार सिस्टम नहीं है. सरकार दावा ज़रूर करती है कि वो समस्या से निपटने के लिए काफ़ी कुछ कर रही है, लेकिन इससे यह भी साबित होता है कि सरकार समस्या से निपटने के लिए बहुत इच्छुक नज़र नहीं आती. वो कहते हैं, "कुपोषण के मामलों को एक तय समय में सामने लाने के लिए कोई सही सिस्टम नही है. अगर ऐसा होता तो सरकार इससे वक़्त रहते निपट सकती है." उनका यह भी मानना है कि ये आंकड़े सिर्छ उन परिवारों के हैं जिनसे आसानी से बात की जा सकती है. लाखों लोग ऐसे हैं जो कहीं से आकर यहां बसे हैं, वो किसी आंगनबाड़ी में रजिस्टर्ड नहीं हैं. अगर उन्हें भी शामिल कर लिया जाए तो राज्य में कुपोषित बच्चों की संख्या और बढ़ जाएगी. बनासकांठा ज़िला में सक्रिय एक्टिविस्ट जोसेफ़ पटेलिया का भी मानना है कि ये आंकड़े महज दिखावा है. "सरकार अब तक उन मज़दूरों और परिवारों तक नहीं पहुंची है जो अब तक आंगनबाड़ी से दूर हैं."


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