कभी सोचा ना था, ऐसा वक़्त भी आयेगा - प्रगति वाघेला

कभी सोचा ना था, ऐसा वक़्त भी आयेगा



प्यारे दोस्तों से मिलने से भी मन कतरायेगा,
मां-बाप अपनी बेटी को पीहर आने न देंगे,
सास-ससुर बहू को घर से बाहर जाने ‌न देंगे,
छुट्टी मेड के लिए भी दरवाजा खुल न पायेगा,
कभी सोचा ना था.. ऐसा वक़्त भी आयेगा !



मां बोले - फोन पर बातें करती  रहना,
वीडियो कॉल करके शक्ल देख लेना,
पर पीहर की तरफ कदम मत बढ़ाना..!
सासुजी बोलें - दो चार काम कम कर लेना,
कहा-सुनी हो तो दो बातें तुम भी कह लेना,
पर पर्स उठाकर चल मत देना, 
कभी सोचा ना था.. ऐसा वक़्त भी आयेगा !



बहू बोले- सासुजी! टोका टाकी कर लेना, 
जी चाहे उतना हमसे लड़ लेना,
पर मंदिरों की तरफ मुड़ मत जाना,
ससुर जी ! चाय पर चाय बनवा लेना,
हिसाब-किताब घर पर ही कर लेना, 
पर बाजार की ओर मत निकल जाना,



पति देव ! घोड़े बेच कर सो लेना, 
भले टीवी से ही चिपके रहना,
पर आफिस की ओर रुख मत करना,
बच्चों ! घर में भले इतना मचाना तूफान,
कि हम अपने घर को ही ना सके पहचान, 
पर बोर हो रहे हैं घर में, क्या करें? 
कह घर से बाहर भाग मत जाना, 
एक वायरस! ऐसी भी भावनाएं जगाएगा ,
कभी सोचा ना था.. ऐसा वक़्त भी आयेगा !



दोस्तों से मिलने के लिए मन तरसेगा,
वक़्त तो बहुत होगा, पर मिल नहीं पायेंगे,
केवल सलामती की दुआएं करते रह जाएंगे,  
मेल-मिलाप की जगह परस्पर दूरियां बढाएंगे।
एक विदेशी वायरस, ऐसा हमें डरायेगा, 
जिंदगी की लड़ाई, अकेले लड़ना सिखाएगा,
कभी सोचा ना था.. ऐसा वक़्त भी आयेगा !


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