किस हाल में हैं कांग्रेस से बीजेपी गए नेता सिंधिया को जॉइन कराने के वक्त न मोदी थे और न ही शाह - दिनेश साहू

लेखक दैनिक रोजगार के पल के प्रधान संपादक है



लोकसभा चुनाव 2019 से कुछ पहले कई पार्टियों की यात्रा करके बीजेपी पहुंचे एक सांसद से एक कार्यक्रम में मुलाकात हुई.सांसद महोदय से पहले भी अच्छी बातचीत होती रही थी. मैंने उनसे धीरे से पूछा, "आख़िर क्या आप सिर्फ सांसदी के ही कारण अपनी पार्टी छोड़कर बीजेपी में शामिल हुए थे?" सांसद महोदय ने मुस्कराते हए शांत रहने का इशारा किया और कान में बोले, "इस पर बाद में बात में करूंगा." बाद में मिले, बात हुई और ज़ाहिर है, दर्द भी छलक उठा. लेकिन इस बात का संतोष उन्हें ज़रूर था कि तुलनात्मक रूप से तो वो फ़ायदे में ही हैं, क्योंकि अपनी पिछली पार्टी में होते तो शायद संसद में भी न पहुंच पाते. सांसद महोदय बीजेपी में आने से ठीक पहले कांग्रेस पार्टी में थे और तब भी सांसद थे. हाल ही में जब मध्य प्रदेश कांग्रेस के दिग्गज नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया कांग्रेस पार्टी से अपना करीब दो दशक का और पारिवारिक तौर पर कई दशक पुराना साथ छोड़ कर बीजेपी में शामिल हुए तो राजनीतिक गलियारों में उन नेताओं की ख़ासतौर पर चर्चा होने लगी जो पिछले चार-पांच वर्षों में कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में शामिल हुए हैं. इन सभी नेताओं ने आस्था परिवर्तन की लगभग वही वजहें बताई थीं जो सिंधिया ने बताई. सभी को ये उम्मीद थी कि कांग्रेस में उनका वो सम्मान नहीं हुआ जिसके वो हकदार थे और बीजेपी ऐसी पार्टी है जहां सब का सम्मान होता है. इन नेताओं की सूची में जगदंबिका पाल, रीता बहुगुणा जोशी, उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा, डॉक्टर संजय सिंह, राजकुमारी रत्ना सिंह, रायबरेली में विधायक दिनेश सिंह और उनके भाई, अम्मार रिज़वी जैसे कई नाम हैं. इनमें लगभग सभी लोग कांग्रेस पार्टी में न सिर्फ महत्वपूर्ण पदों पर रहे बल्कि विधायक, सांसद और मंत्री भी रहे. - ज्योतिरादित्य सिंधिया के कांग्रेस छोड़ने से क्या-क्या बदल जाएगा? सिंधिया बीजेपी में शामिल हए. बताई कांग्रेस छोड़ने की वजह


पार्टी से मोहभंग क्यों हआ?


विजय बहुगुणा जहां हाईकोर्ट में जज की नौकरी छोड़कर सीधे कांग्रेस पार्टी से सांसद और फिर उत्तराखंड के मुख्यमंत्री बने वहीं डॉक्टर संजय सिंह को कांग्रेस पार्टी ने असम से राज्य सभा में भेजा. बावजूद इसके, इन लोगों का पार्टी से मोहभंग क्यों हुआ? कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता वीरेंद्र मदान कहते हैं, "सिर्फ पॉवर पॉलिटिक्स करना चाह रहे हैं ये लोग. ये जितने भी नेता पार्टी छोड़कर गए हैं, उनकी पहचान और उनका कद कांग्रेस पार्टी ने बनाया है जिसके साथ वो धोखा कर रहे हैं. राजनीति में तमाम उदाहरण हैं कि जनता ने दलबदलुओं को पसंद नहीं किया है. इनके साथ भी ऐसा ही होगा. यह ठीक है कि आज कांग्रेस पार्टी की वह स्थिति नहीं है जो पहले थी लेकिन इसका ये मतलब तो नहीं होता कि आप पार्टी के अच्छे दिनों का लाभ उठाकर अपनी हैसियत बनाइए और पार्टी के ख़राब दिनों में उस हैसियत का फ़ायदा उठाकर पार्टी की पीठ में छुरा भोंक दीजिए." सत्ताधारी पार्टी में शामिल होने के पीछे शामिल होने वाले नेता कुछ भी कहें लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि ये नेता किसी लोभ में ही जाते हैं. जहां तक सम्मान की बात है तो ये दिखने से ज़्यादा महसूस करने वाली चीज़ है. लेकिन ये ज़रूर है कि जो भी नेता कांग्रेस ए, उनमें से कुछ को तात्कालिक लाभ भले ही मिला हो लेकिन ज़्यादातर को ऐसा कुछ शायद ही मिला हो जिसके एवज़ में वो निष्ठा बदल लेते. वरिष्ठ पत्रकार योगेश मिश्र कहते हैं, "यह स्थिति सिर्फ कांग्रेस के नेताओं की नहीं है बल्कि अन्य दलों से भी जो लोग आए, आप बीजेपी में उनकी हैसियत देख लीजिए. रीता बहुगुणा जोशी को तो खैर बीजेपी ने काफ़ी कुछ दे दिया, अब भले ही उन्हें किनारे कर दिया गया हो लेकिन स्वामी प्रसाद मौर्य, जगदंबिका पाल, रत्ना सिंह, संजय सिंह, संजय सेठ, नीरज शेखर जैसे नेताओं को क्या मिला? ये लोग अपनी पार्टियों में शीर्ष नेताओं में गिने जाते थे लेकिन बीजेपी में इनकी वो हैसियत नहीं है और पहले से मौजूद नेता वो हैसियत कभी बनने भी नहीं देंगे."हालांकि इस बात को ये नेता ख़ुद स्वीकार नहीं करते हैं.


रीता बहुगुणा जोशी के साथ क्या हुआ?



इलाहाबाद से लोकसभा सदस्य रीता बहुगुणा जोशी साल 2017 में यूपी विधान सभा चुनाव से ठीक पहले बीजेपी में शामिल हो गई थीं. उन्हें बीजेपी ने लखनऊ में उसी विधान सभा सीट से टिकट दिया जहां से वो कांग्रेस पार्टी से विधायक थीं. रीता जोशी चुनाव जीती, कैबिनेट मंत्री बनीं और फिर पार्टी ने उन्हें लोकसभा चुनाव में उतार दिया. ऐसी अटकलें थीं कि सरकार बनने पर उन्हें केंद्र में किसी महत्वपूर्ण विभाग का मंत्री बनाया जाएगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ. रीता जोशी को मंत्री क्यों नहीं बनाया गया इस बारे में वो कुछ भी नहीं कहती लेकिन कांग्रेस छोड़ने की वजह वो ये बताती हैं, "मैंने कांग्रेस पार्टी के लिए 24 सालों तक मेहनत की. लेकिन अब जनता का विश्वास कांग्रेस पार्टी और उसके नेताओं में नहीं रहा. देश को नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में विश्वास है इसलिए हमने भी उनके साथ चलना बेहतर समझा." रीता बहुगुणा जोशी महिला कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष के अलावा उत्तर प्रदेश कांग्रेस की भी अध्यक्ष रह चुकी हैं और साल 2012 में पार्टी ने उन्हीं के नेतृत्व में चुनाव लड़ा था. इसके अलावा वो समाजवादी पार्टी में भी रह चुकी हैं. उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा उनके बड़े भाई हैं. रीता जोशी के बेहद करीबी बीजेपी के एक नेता ने भी उनके साथ ही कांग्रेस पार्टी छोड़ दी थी. नाम न छापने की शर्त पर वो कहते हैं, "हैसियत और सम्मान तो उनका कांग्रेस पार्टी में ही था. अब आप ही देख लीजिए कि जहां वो खुद टिकट बांटती थीं, आज एक टिकट लेने के लिए लाले पड़ रहे हैं. तमाम कोशिशों के बावजूद अपने बेटे के लिए पार्टी में कोई जगह नहीं बना पा रही हैं."


राजीव गांधी के करीबी रहे संजय सिंह के साथ क्या हआ?


पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के बेहद करीबी रहे अमेठी के पूर्व सांसद और पूर्व मंत्री संजय सिंह और लोकसभा चुनाव के बाद प्रतापगढ़ से कई बार सांसद रह चुकीं और पूर्व विदेश मंत्री दिनेश सिंह की बेटी राजकुमारी रत्ना सिंह का कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में जाना बेहद चौंकाने वाला था. संजय सिंह के बारे में राजनीतिक गलियारों में आशंका जताई गई कि शायद वो अपनी राज्यसभा सीट बचाने के लिए बीजेपी में गए हों लेकिन रत्ना सिंह का हृदय परिवर्तन किसी की समझ में नहीं आया. दिलचस्प बात ये है कि इनमें से किसी भी नेता को बीजेपी में कोई महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी तक नहीं दी गई है.


सम्मान न मिलने के बावजूद बीजेपी में क्यों हो रहे शामिल?


बीजेपी प्रवक्ता राकेश त्रिपाठी इस बात से इनकार करते हैं कि अन्य पार्टियों से आने वाले नेताओं को बीजेपी में तवज्जो नहीं मिलती. वो कहते हैं कि बीजेपी में शामिल होने वाला हर व्यक्ति पार्टी में बराबर की हैसियत रखता है, चाहे वो कार्यकर्ता हो या फिर विधायक, सांसद या मंत्री. हालांकि इस बात का उनके पास जवाब नहीं है कि समानता की इस स्थिति में बाहर से आए किसी व्यक्ति को तुरंत राज्यसभा की सीट मिल जाती है जबकि वर्षों से पार्टी में कार्यकर्ता बने रहे लोगों से आगे भी निष्ठापूर्वक कार्यकर्ता बने रहने की अपेक्षा की जाती है. अपेक्षित सम्मान न मिलने के बावजूद नेताओं का बीजेपी में शामिल होना क्यों जारी है, इस सवाल के जवाब में योगेश मिश्र कहते हैं, "आज का राजनेता खालि राजनेता नहीं रहा, वो किसी न किसी कारोबार से भी जुड़ा है. सरकार के साथ रहने में उसके कारोबार कोसंरक्षण मिलेगा और उसके दूसरे हित भी सधैंगे. यह सबसे बड़ी वजह है. बाक़ी जो लोग विचारधारा के चलते किसी पार्टी से जुड़े हैं, वो विचारधारा इतनी आसानी से नहीं छोड़ पाएंगे." वे कहते हैं, "कांग्रेस में भी कितने लोग हैं जो लंबे समय से सत्ता से दूर रहे हैं लेकिन पार्टी में बने हैं और बीजेपी में भी ऐसे तमाम लोग हैं जो लंबे समय तक विपक्ष में रहे लेकिन अपनी पार्टी उन्होंने नहीं छोड़ी. आख़िर प्रलोभन तो ऐसे लोगों को भी मिलता ही होगा."


'सिंधिया को जॉइन कराने के वक्त न मोदी थे और न ही शाह'



ज्योतिरादित्य सिंधिया को कांग्रेस पार्टी ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाया था जबकि पूर्वी उत्तर प्रदेश की प्रभारी प्रियंका गांधी हैं. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उनकी सक्रियता न के बराबर थी. कांग्रेस नेता वीरेंद्र मदान कहते हैं कि बीजेपी में उनकी क्या हैसियत है, ये पहले दिन से ही समझ में आ गई जब उन्हें जॉइन कराने के लिए न तो प्रधानमंत्री थे और न ही अमित शाह. बहरहाल, इन सबके बावजूद, कांग्रेस पार्टी के कई अन्य नेताओं के भी मोहभंग की चर्चाएं गाहे-बगाहे होती ही रहती हैं.


 


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