<no title>कोरोनाः इटली या ब्रिटेन जैसे यूरोप के देशों में सख़्त लॉकडाउन नियमों के उलट स्वीडन ने अपने यहां नागरिकों को खुद ही ज़िम्मेदार रहने के लिए समझाया है.


इटली या ब्रिटेन जैसे यूरोप के देशों में सख़्त लॉकडाउन नियमों के उलट स्वीडन ने अपने यहां नागरिकों को खुद ही ज़िम्मेदार रहने के लिए समझाया है. स्वीडन ने इसके लिए केवल गाइडलाइंस जारी की हैं. ज्यादातर लोग घरों से काम कर रहे हैं, लेकिन लोग बाहर निकल गर्म मौसम का आनंद भी ले रहे हैं. क्या स्वीडन के ये ढीले नियम कोरोना की जंग जीतने में मददगार साबित होंगे? लंबी सर्दियों के बाद स्वीडन में अब इतनी गर्मी शुरू हुई है कि लोग बाहर बैठ पाएं. राजधानी स्टॉकहोम के लोग इस मौसम का आनंद उठाने के लिए बाहर निकलने भी लगे हैं. पड़ोसी डेनमार्क या ब्रिटेन से इसकी तुलना करें तो बड़ा अंतर नज़र आता है. डेनमार्क में मीटिंग्स को 10 लोगों तक सीमित कर दिया है. ब्रिटेन में आप अपने घर के बाहर किसी से भी नहीं मिल सकते. 'हर शख्स पर भारी ज़िम्मेदारी हैइस कंपनी का अनुमान है कि घर से काम करने वालों की तादाद 90 फ़ीसदी तक पहुंच सकती है. इसकी वजह यह है कि यहां की वर्कफोर्स बड़े पैमाने पर टेक-सेवी है. साथ ही देश का कारोबारी कल्चर ऐसा है जिसमें लचीले और रिमोट वर्किग प्रैक्टिस को लंबे समय से बढ़ावा दिया जा रहा है. कंपनी के सीईओ स्टाफ़ान इनग्वारसन ने कहा, "जिस भी कंपनी में ऐसा करने की गुंजाइश है वहां वर्क फ्रॉम होम की अनुमति दी जा रही है." स्वीडन सरकार की रणनीति है कि लोग खुद ही अपनी ज़िम्मेदारी को समझें. सरकार पर बेहद भरोसा एक प्रमुख पोलिंग कंपनी नोवस के पूरे देश में कराए गए सर्वे के मुताबिक, स्वीडन के अधिकतर लोगों ने प्रधानमंत्री की स्पीच को देखा और इस पर सहमति जताई. दूसरी ओर, स्वीडन में सरकारी अधिकारियों पर उच्च स्तर पर भरोसा है. इसके चलते ही माना जा रहा है कि स्वीडन के लोग स्वेच्छा से इन गाइडलाइंस का पालन कर रहे हैं. इससे वायरस के परिवारों में फैलने की आशंका घट जाती है. दूसरी ओर, स्वीडन के लोग बाहर निकलना पंसद करते हैं. अधिकारियों का कहना है कि इसके चलते लोग मानसिक और शारीरिक रूप से स्वस्थ रहते हैं. ऐसे में लोगों के घरों में बंद रहने के नियम को न मानने की संभावना है. 'इतिहास ही फैसला करेगा' लेकिन, एक तरफ जहां स्वीडन के लोग यूरोप के दूसरे देशों को कोरोना की महामारी में बुरी तरह से फंसा देख रहे हैं, वहीं कई अन्य लोगों ने देश के एक अनोखे एप्रोच पर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं. स्वीडिश मेडिकल यूनिवर्सिटी द कैरोलिंस्का इंस्टीट्यूट में एपीडेमियोलॉजिस्ट डॉ. एमा फ्रांस ने कहा, 'मुझे लगता है कि लोग हमारी सिफ़ारिशें मानते हैं, लेकिन जिस तरह की गंभीर स्थिति अभी है उसे देखते हुए मुझे ये क़दम पर्याप्त नहीं लगते.' साथ ही कुछ लोगों का कारोबार भले ही चल रहा है, लेकिन दूसरे कई लोग इससे जूझ रहे हैं. मारियाटॉर्गेट के व्यस्त बार हो या लोकप्रिय हिप्सटर बार्बर शॉप ऑनेस्ट अल्स, इन्हें ग्राहकों की संख्या में गिरावट का सामना करना पड़ रहा है. मालिक अल मोकिका कहते हैं, 'मेरी पत्नी की खुद की कंपनी है, ऐसे में हम अपने पर ही निर्भर हैं. कारोबार बुरा चल रहा है. मैं अभी तक बिल नहीं चुका पाया हूं. हमें बैंकों को इस बारे में बताना होगा.' डॉ. एमा का कहना है कि केवल इतिहास ही इस बात का फैसला करेगा कि यूरोप के किस राजनेता और वैज्ञानिकों ने इस मामले में सबसे बढ़िया फ़ैसले किए.


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