पाने को कुछ नहीं,* *ले जाने को कुछ नहीं;* - विजय साहू

*पाने को कुछ नहीं,*
*ले जाने को कुछ नहीं;*
*उड़ जाएंगे एक दिन...*
*तस्वीर से रंगों की तरह!*
*हम वक्त की टहनी पर...*
*बैठे हैं परिंदों की तरह !!*
*खटखटाते रहिए दरवाजा...*
*एक दूसरे के मन का;*
*मुलाकातें ना सही,*
*आहटें आती रहनी चाहिए !!*
*ना राज़ है... “ज़िन्दगी”*
*ना नाराज़ है... “ज़िन्दगी"*
*बस जो है, वो आज है... “ज़िन्दगी”*


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