रामनामाकंन, उसके नाम का अंकन करते हुए हम उसे अनुभूत करना चाहते हैं, जिसका कभी चिंतन,मनन,ध्यान,भी नहीं किया जासकता।

नाम राम कथा 194:-
रामनामाकंन, उसके नाम का अंकन करते हुए हम उसे अनुभूत करना चाहते हैं, जिसका कभी चिंतन,मनन,ध्यान,भी नहीं किया जासकता।
और वो "राम" सर्वत्र होकर,सदासंग रहकर भी सारे प्रयासों के पश्चात भी जानने,मानने में नहीं आता बल्कि, उसका तो अनुमान भी नहीं लगा सकते, ।
तरकि न सकहिं सकल अनुमानी""' ।।।।
हां सहज भाव से ,उसका नामाकंन करते करते ,सहजतापूर्ण नामाकंन होने लग जाये,तो सहजभावसे सहजहोकर सहजबैठ जाने से, उसकी सहजानुभूति सहजसंभव हैं। 
रामान्दाचार्यजी के एक शिष्य हुए कबीर दास, उनको गुरू मंत्र दिक्षा में मात्र एक छोटासा मंत्र मिला, "राम" और उस राम राम राम राम को अपना लेने के बाद कबीर में जो सहजता प्रकट हुई,या कबीर को जो सहजता अनुभूत हुई, फिर वो सहज ही होगये।
और उन्होंने हमको उपदेश दिया,कि सहज भाव में रहो, जगत आपके साथ ना जाने क्या क्या करेगा,आप उसके प्रति सहजरहो, जगतनीचे उपर दिखाने का प्रयास करेगा,आप सहज रहो। क्योंकि परमात्मा परिश्रम से अनुभूत नहीं होता,क्योंकि वो कृतिसाध्य नहीं हैं। उसकी सहजता को अनुभूत करने के लिए आरंभ में कुछ अभ्यास कराये जाते हैं, उसका उदेश्य कर्ताभाव से मुक्त कराना हैं।
आरम्भ में जो करता भाव हैं, वो ही जाकर अकृतत्वता में स्थित करता हैं, अतः ससंकल्प रामनामाकंन हैं।


सतत सप्रेम ,रामनामाकंनसे उत्पन्न रामनामानुराग से जो रामनामामृतपान होता हैं, वो सहज ही सहजता में स्थित कर देता हैं, और विलक्षण घटना किस क्षण में घटती हैं, वो रामकृपा पर निर्भर हैं, 
पर जिनके घट में घटी, वो वो ही होगया। 
संतो शास्त्रों ने बताया कि, छोटे- से -छोटा साधन हैं, तीर्थयात्रा । उससे ऊँचा साधन हैं शास्त्र चिंतन । शास्त्र चिंतन से ऊंचा हैं साधन हैं ध्यान धारणा। ‌और. इनसे सबसे ऊँचा, या यो कहलो कि ऊँचा से ऊँचा जो भी साधन हो सकता हैं उससे भी ऊँचा साधन हैं सहजावस्था। वो सहज समाधि, हैं। उस सहजावस्था में आप पहुंच जायेगें।


सहज अवस्था न जाग्रत हैं न स्वप्न हैं न सुषुप्ति हैं,न मुर्छा हैं,न समाधि हैं, बस वो तो 'हैं' ।
सुषुप्ति और सहजावस्था में एक फर्क हैं ।
सुषुप्ति में बेहोशी रहती हैं पर सहजावस्था में बेहोशी नहीं रहती, सहजावस्था में होश रहता हैं। जाग्रति रहती हैंं,ज्ञानकी एक लो रहती हैं।
यह रामनामामृतपानोपरांत अनुभव में आती हैं, या अत्यंत समर्पित भाव से रामायण गीता का पाठ करते रहने से भी आ सकती हैं। जब साधक निराभाव, बिनाकिसी लक्ष्य के मानस पाठ कर रहा होता हैं, तो करते करते एक एसी अवस्था आजाती हैं, जिसमें आखें खुली होकर भी सबकुछ अदृष्ट रहता हैं, सामने मानस का दर्शन होते हुए भी मानस अदृष्ट रहती हैं, औअसन पर बैठे हुए भी कौन कब कहां बैठा,क्यों बैठा, सब कुछ केभाव से निराभाव में स्थित होजाता हैं, ।
राम कृपा पावे कोई कोई।


यह सुख साधन ते नहीं होई।।।
यह मानस के माध्यम से स्वयं को रामार्पण करने का भाव, मानस का चिंतन मनन करने से नहीं उपलब्ध होता बल्कि रामकृपासे स्वतः सहज ही मानस के समक्ष बैठे बैठे सप्रेम समर्पित भाव से पाठ करते करते जब स्वतः पाठ होने लगता हैं, तब रामकृपा से ही अनोखी, विलक्षण अवस्था उपलब्ध होती हैं और रामनामाकंन कर्ता या मानस पाठकर्ता उस अवस्था को उपलब्ध होजाता हैं। 
राम कृपा पावे कोई कोई।
मुझे इस कृपा की अनुभूति उन क्षणों में हुई, जब मेरे पास‌मानस पाठ में बैठने से पहले अगरबत्ती भी उपलब्ध नहीं हो पाती थी, ।
उस अवस्था की पहचान तो बाद में हो पायी जब रामनामाकंन करते करते पुनः पुनः उस अवस्थाको उपलब्ध हुआ, जब रामनाममहामंत्रों की प्रदक्षिणा करते हुए उस अवस्था को उपलब्ध हुआ, पर उसका वर्णन , रामजी के सहज स्वरूप का वर्णन संतो शास्त्रों के माध्यम से अनुमानित हुआ, ।
कभी कभी जब हम मानस पाठ करने बैठ जायें,और पाठ करते करते,ही अतंर से चुपी छाजायें, आंखों के दृश्य औझल होजाये, , बाहरी भीतरी दृश्यों से स्वयं को मुक्त अनुभूत करते हुए उस अवस्था में पहुंच जायें कि, वहाँ कोई हैं ही नहीं, न स्वयं न स्थान, न परमात्मा, न कुछ, जाग्रत अवस्था में पुर्ण रुइपेण बेहोशी की अवस्था।
यह अनुभूति प्रकृति से परे की हैं। 
ऎसी अवस्था प्रत्येक रामनामाकंन कर्ता को अनुभूत हों, एसी रामजी से प्रार्थना ।


एक कबीर दासजी का भजन सुनने में आया,वो उस अवस्था की अनुभूति कराता हैं।


साधो सहज समाधि भली।
गुरु प्रताप जा दिन तैं उपजी दिन दिन अधिक चली।।
जहं जहं डोलो सोई परिक्रमा जो कुछ करो सो सेवा।
जब सोचो तब करो दण्डवत पूजो और न देवा।।
कहों सो नाम,सुनों सो सुमिरन खांव पियो सो पूजा।
गिरह उजाड़ एक सम लेखों,भाव न राखों दूजा।
आंख न मूँदों, कान न रूँधो,तनिक कष्ट नहीं धारौं।
खुले नैन पहिचानो हंसि हंसि सुंदर रूप निहारौं।
रामनाम धुन मन ते लागी,मलिन वासना त्यागी।
उठत बैठत कभी न छूटॆ एसी तारी लागी।।
कह कबीर यह उनमनी रहनी,सो परगट करि भाई।
दुख सुख से कोई परे‌ परम पद,तेही पद रहा समाई।।


यह अवस्था जब हम रामनामाकंन करते करते बाहर भीतर से शांत हो जाते हैं तब परगट हो जाती हैं, ।
बैठते हैं रामायण पाठ करने,रामनामाकंन करने पर जब कुछसमय बाद पाठ करते करते,या रामनाम क अंकन करते करते, कृत्य भाव से च्युत हो जाते हैं,और बैठे ही रहजाते हैं, बिना कुछ करने धरने के भाव से, अपने होने के भाव से भी परे, वो एसी सहजावस्था बस जिसका वर्णन तो हो ही नहीं सकता। 
तो समस्त रामनामाकंन कर्ता भक्तों के जीवन में यह अनुभव आयें। इसी प्रार्थना सहित।


जयति रामनामाकंनम्।
रामनामाकंनम् बिजयते।।


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