ससंकल्प,सप्रेम,रामनामाकंन करते रहना,निर्दोषता एवं निर्मल मन को अनुभव करायेगा।

नाम राम कथा 186:-
प्रेमाप्तसंकल्पेन,अंकनातनामरामः।
अनुभवेत् निर्विकारेण,निर्मना निर्दोषिताः।।
ससंकल्प,सप्रेम,रामनामाकंन करते रहना,निर्दोषता एवं निर्मल मन को अनुभव करायेगा।
गंताकं से आगे:-
तो हमें कल स्वामीजी ने बताया था कि, हमारा निज स्वरूप सदा निर्दोष हैं, और गोस्वामी जी ने उसीको अमल कहा हैं, साथ ही सुख की राशि भी कहा हैं, और गोस्वामीजी तो गो के स्वामी हैं तो उन्होंने चेतन भी कहा हैं। और उस चेतन तत्त्व को रामनामोपनिषद ने रामात्मा कहा, अनुभव की उतरोत्तर अवस्थानुरुप परावर्तित अवस्थाओं को मानवात्मा,सर्वात्मा,रामात्मा या परमात्मा कहा और समझाया ।
तो हमको समझाया गया कि, यह हम जो अपने में दोष मान बैठते हैं, वो अवधारणा ही गलत हैं, और उस अवधारणा को मिटाने या नये रुप में या वास्तविक स्वरूप में अनुभव करने, मान्यता देने केलिए सर्वोच्च एवं सर्वोत्तम साधन रामनामाकंन ही हैं। 
इससे सुगम साधन और कोई नहीं, आदि योगी भगवान शिव ने इसका प्रतिपादन किया तो कलि के मानवों को इसको अपनाने में क्यों दुविधा होनी चाहिए?


स्वामीजी ने तो बताया और समझाया कि, दोष आने जाने वाले हैं, वो न तो पहले थे, और न बाद में रहेगें। वो तो आगन्तुक हैं, पर हम और. हमारा अपना स्वरूप आगन्तुक नहीं हैं, वो तो सदा सर्वदा हैं स्थायी हैं ।
भाईयों हमारे मकान में कोई आता या जाता हैं तो वो हम नहीं और हमारा नहीं हैं न ? वो तो कोई और ही हुआ ना ? तो जैसे मकान में मेहमान आये गये वैसे ही कभी कभी कोई दोष आते जाते रहते हैं, तो वो अस्थायी ही हुए ना ?
तो उनको अपनामान लेना ही बडी़ भूल हैं ।


स्वामी जी ने एक और उदाहरण देकर बता रहे कि, जैसे दर्पण में हम नहीं हैं, पर ज्योंहि हम दर्पण के सामने जाते हैं उसमें हमारा प्रतिबिंब उभर आता और ज्योंहि दर्पण के समक्ष से हटते हैं,वैसे ही दर्पण में हम नहीं होते,हमारा प्रतिबिम्ब भी नहीं रहता, तो वैसे ही न तो हमारे अपने में कोई दोष होते हैं, और ना ही किसी और में होते हैं। 
यह तो शुद्ध स्वच्छ कांच के खाली गीलास जैसा हैं, उसमें जिस रंग का तरल पदार्थ डालदें वैसे ही भाषीत होने लगेगा, पर क्षणिक, जैसे ही उस पदार्थ को गीराया और गीलास वापस शुद्ध स्वच्छ ,पारदर्शक होजाता हैं।
तो एक सिद्धांत इसके बारे में दिया गया हैं कि, जो आदि और अंत में नहीं होता, वो मध्य में भी नही ही होता। 
परंतु हमारा ध्यान विशेषकर वर्तमान की दशा पर जाता हैं तो हम उसको ही मान्यता देते रहते हैं। जैसे आकाश में आरही काली आंधी से आकाश क्षणिक काल तक काला दिखाई देने लगता हैं पर तत्क्षण हम आकाश को काला मान बैठते हैं, यही भारी भूल हैं।


दुसरी बडी़ भारी भूल हम दुसरों में दोष मानने की करते हैं,अरे भाई जब हमारे स्वरूप में कोई दोष नहीं तो दुसरे में कैसे होसकता हैं ! 
जैसे हमारा स्वरूप स्वतः निर्दोष हैं तो सबका स्वरूप ही निर्दोषतायुक्त ही हैं ना ! हम अपने को निर्दोष और दुसरे को सदोष मानते रहेंगें तो भी बात वही हैं कि, हम अपने स्वरूप को नहीं देख पाये, हमारा ध्यान मात्र दोषों पर ही हैं।
गोस्वामी तुलसीदास जी ने कहा कि, जब रामनाम महाराज की कृपा प्राप्त होने लगजाती हैं, या रामनामानुराग उत्पन्न हो जाता हैं तब मन बुद्धि चित की अवस्था ऎसी होजाती हैं कि, वो जागते में तो क्या स्वप्न में भी दुसरे के दोष नहीं देखता हैं। 
"सपनेहु नहीं देखहीं पर दोषा""
इसको गोसाईं जी का उपदेश भी माना जा सकता हैं, जिनको रामनामाकंन की अभिलाषा तो जाग्रत होगयी परंतु अभी अनुराग उत्पन्न नहीं हुआ तो उनकी साधना की सफलता हेतु सदुपदेश भी हैं, तब कहा जायेगा कि,
""" सपनेहु नहीं देखहू पर दोषा""
तो स्वामीजी ने कहा कि, कभी किसी को दोषी नहीं मानना चाहिए, अर्थात हमारी दृष्टि उसके निर्दोष स्वरूप पर ही रहनी चाहिए।
ऐसा समझना चाहिए कि, दुसरे ने आगुन्तक दोष के कारण वशीभूत होकर कोई क्रिया करदी, तो न तो वह क्रिया स्थायी रहेगी,न उसका फल स्थायी रहेगा,पर उसका निज स्वरूप स्थायी रहेगा ।
गोस्वामी जी ने स्वप्न में भी पर दोष नहीं देखने की जो हिदायत दी हैं, उसके गहरे कारण हैं। 
गोस्वामी जी कलिके साधकों के हित की बात कहे हैं, ।
पर दोष देखने में नुकसान क्या होने वाला हैं,उसको स्वामी जी ने समझाया कि, 
अगर हम दुसरों में दोष मानेगें तो उसमें वे दोष आ जायेगें; क्योंकि उस में दोष देखने से हमारा त्याग,तप,बल, आदि भी उस दोष को पैदा करने में सहायक हो जायेगा, जिससे वह व्यक्ति दोषी हो जायेगा ।
दुसरा उस में दोष आये या नहीं आये पर साधक का तप,बल,त्याग तो उस दोष को देखने की भेंट चढ़ गया तो ,हमारी दृष्टि दोष देखने की आदि हो जाती हैं और हम अपनी निर्दोषिता देखने से वंचित होकर दोष दृष्टि के स्वामी हो जाते है।
तो गोस्वामी जी के सिद्धांत की दृष्टि से पुत्र,शिष्य,या सखा सबको निर्दोष मानकर ही व्यवहार करना चाहिए, बल्कि सबके स्वरूप को
"""सियाराम मयसब जग जानी"'
सियाराममय मान कर व्यवहार करना चाहिए ।


दुसरा ,स्वामी जी ने सदुपदेश दिया कि, रामनामाकंन कर्ता साधकों को,
कभी मन,बुद्धि के वशीभूत होकर ऎसा हो भी जाये, तो स्वयं को क्षमा करते हुए जिसके भी प्रति इस प्रकार का विचार आया या जिसमें भी दोष देखने का प्रयास हुआ उससे भी मन ही मन क्षमा याचना कर लेने से उस दोष के प्रभाव से बचा जा सकता है।
अच्छा एक बात ऎसे साधकों को उत्साहित भी करेंगी, मानो किसी ने आपको कडवी बात कह दी, और आपको उस पर गुस्सा नहीं आया तो आपके भीतर एक सोत्साह प्रसन्नता होगी। 
कि देखो रामनामाकंन की कृपा या प्रताप से हम गुस्सा होने सेबच गये और हमारा तप क्षीण होने सेबच गया। रामनाम महाराज ने हमें दूषित होने से बचा लिया।
इसका एक महत्वपूर्ण कारण यह भी हैं कि, हम किसी में भी कोई भी अवगुण‌ देखते हैं तो वो ही अवगुण‌ पहले हमारे में जाग्रत हो जाता हैं और फिर आ भी जाता हैं, तो रामनामाकंन कर्ता साधकों को क्या बल्कि किसी भी प्रकार के साधकों को किसी के भी गुणावगुण नहीं देखना ही बेहतर होगा। न उसके वशीभूत होना चाहिए, अक्सर अपनी श्रेष्ठता प्रदर्शित करने की अहंकारी प्रवृत्ति के वशीभूत होकर जीवात्मा यह भूल जान बूझ कर करते भी देखा जाता हैं, पर इस भूल से बचने के लिए अपने को नहीं बल्कि परमात्मा को या परमात्मा के आदि नाम रामनाम महाराज की कृपा को महत्वपूर्ण मानना चाहिए।
अब इन के पिच्छे मूल दोष क्या हैं ? 
‌स्वछन्दता, मिली हुई स्वतंत्रता का दुरुपयोग ।
हम असत् की अर्थात अविद्या को महत्व देतें हैं या विद्या को ! हम चाहें तो असत् की सत्ता को मानॆ भी और नहीं भी मानें, यह हमारी अपनी स्वतंत्रता हैं। छल कपट हींसा आदि कर भी सकते हैं और नहीं भी ! यह मिली हुई स्वतंत्रता हैं, सच तो यही हैं कि जब से इस स्वतंत्रता का दुरुपयोग हुआ तब सेजन्म मरण केचक्कर में पडे़ है, जब इसका‌ दुरुपयोग बन्द होजायेगा तभी जीबन मरण केचक्कर से छुटकारा होजायेगा , इसी लिए गोस्वामी जी ने जागते हुए तो क्या बल्कि स्वप्न में भी परदोष देखने वाली वृति को त्यागने पर जोर दिया।
अतः रामनामाकंन करने वाले साधको कों तो यह विशेष ध्यान रखना ही हैं, कि, विद्या और अविद्या दोनो को मान्यता देने के प्रयास से बचते हुए सहज स्वभाव में रहने का प्रयास करते रहें।


कैसे किया जाये इस वृति का अभ्यास ?
तो साधक को एक बात समझ लेना हैं कि, 
जब मनुष्य मिली हुई स्वतंत्रता का दुरुपयोग करके असत् का संग करता हैं तब वह असत् के संग से होने वाले सुखमें आसक्त होजाता हैं। 
संयोगजन्य सुख की आसक्ती से ही सम्पूर्ण दोष पैदा होते हैं। 
असत् पदार्थों में जो रूची हैमन,भोग और संग्रहमें जो अच्छापन दिखता हैं उसको पाने की जो इच्छा होती है—यही सम्पूर्ण दोषों की जड़ हैं।
अच्छा संयोगजन्य सुख की इच्छा उसीमें पैदा होती हैं ,जो दुखी है। दुःखी आदमी ही तो सुख की इच्छा करता हैं। और सुख का अनुभव भी उसी को होता हैं जिसको दुख होता हैं। 
जैसे भोजन का सुख उसकोमिलता हैं जो भूखा होता हैं, जिसका पेटभरा हों तो उसको कितना भी स्वादिष्ट भोजन रखो उसको उसमें सुख की प्राप्ति नहीं होगी । 
तो यह समझ आता हैं कि, सुख के पहले भी दुःख और सुख के‌ बाद भी दुःख ही हैं, ऎसा समझने का प्रयास कर लियाजाये तो, सुखकी इच्छा का त्याग होजाता हैं, क्योंकि दुःख को कोई नहीं चाहता।
और सुख की इच्छा का त्याग होने पर स्वतः सिद्ध निर्दोषता का अनुभव हो जाता हैं ।
तो इस त्याग भावनाकी जागृति होती हैं रामनामानुराग से और रामनामानुरागकी जाग्रति होती हैं, रामनामाकंन से, और रामनामाकंन हेतु प्रेरणा मिलती हैं, श्री राम नाम धन संग्रह बैंक अजमेर से।


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