सतीश गुजराल बने भारत के चोटी के प्रथम चित्रकार ना सुन पाने के बाद भी

भारत सरकार ने गुजराल को 1999 में भारत के दूसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से सम्मानित किया



अपने जीवन का बहुत बड़ा हिस्सा सतीश गुजराल ने एक गूंगे शख़्स के रूप में बिताया. जब वो सिर्फ आठ साल के थे, उनके सुनने की ताक़त चली गई. एक दिन पहलगाम में वो शरारती बच्चों के साथ बड़े पत्थरों से भरी एक नदी को पार करने की कोशिश कर रहे थे, तभी वो तेज़ रफ़्तार पानी में बह गए. उनका पैर एक पत्थर के नीचे फंस गया. इस दुर्घटना में उनकी जान तो बच गई लेकिन उन्हें क़रीब एक साल तक बिस्तर पर रहना पड़ा. उनके बड़े भाई भारत के पूर्व प्रधानमंत्री इंदर कुमार गुजराल ने उनका परिचय जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गाँधी से करवाया. उन्होंने उनके तैल चित्र भी बनाए. बाद में इसका जिक्र करते हुए सतीश गुजराल ने अपनी आत्मकथा में लिखा, "जब इंदिरा का चित्र पूरा हो गया तो मैंने अपने घर में चुनिंदा चित्रकारों, कला आलोचकों और कला प्रेमियों को वो चित्र देखने अपने घर बुलाया. बाद में इंदिरा के पति फ़िरोज़ गांधी के एक दोस्त वरिष्ठ पत्रकार इंदर मल्होत्रा ने मुझे बताया कि फिरोज़ ने उनसे कहा ता कि मैं एक ऐसी महिला की तस्वीर बना कर अपना समय क्यों बर्बाद कर रहा हूँ जिसकी सिर्फ एक ख़ासियत है कि वो प्रधानमंत्री की बेटी है. अगले दिन मशहूर कला इतिहासकार चार्ल्स फ़ाबरी ने स्टेट्समैन अखबार में उस चित्र की आलोचना करते हुए लिखा कि गुजराल इंदिरा गाँधी की शख़्सियत के निचोड़ को चित्रित करने में असफल रहे." नेहरू ने जवाब दिया, "ये इंदिरा गाँधी का बिल्कुल सही चित्रण है." सतीश गुजराल का इंदिरा गांधी का बनाया गया वो चित्र अभी भी इलाहाबाद के आनंद भवन में लगा हुआ है. गुजराल ने अपने चित्रों में जिस संवेदनशीलता के साथ विभाजन की विभीषिका को चित्रित किया, वो अतुलनीय है.


बेल्जियम दूतावास को किया डिज़ाइन 



बेल्जियम दूतावास को किया डिज़ाइन सतीश गुजराल के करियर का सबसे बड़ा ब्रेक तब आया जब उन्होंने दिल्ली में बेल्जियम के दूतावास को न सिर्फ डिज़ाइन किया बल्कि अपनी देखरेख में बनवाया भी. इंटरनेशनल फ़ोरम ऑफ़ आर्किटेक्चर्स ने इसे बीसवीं सदी के सर्वश्रेष्ठ हज़ार भवनों में जगह दी है. बाद में उन्होंने सऊदी अरब के शाह फैसल का फ़ार्म हाउज़, बहरीन के प्रधानमंत्री का निवास, काठमांडू में भारत का दूतावास और गोवा विश्वविद्यालय का भवन और लखनऊ का अंबेदकर स्मारक भी डिज़ाइन किया. भारत सरकार ने गुजराल को 1999 में भारत के दूसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से सम्मानित किया.


 


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