कोरोना वायरस: प्लाज़्मा थेरेपी से कोरोना के गंभीर मरीज़ों के भी ठीक होने की उम्मीद जगी है प्लाज़्मा डोनर सुमिति की कहानी, उन्हीं की जुबानी


प्लाज्मा थेरेपी से कोरोना के गंभीर मरीजों के भी ठीक होने की उम्मीद जगी है. इस थेरेपी के अबतक के ट्रायल के कुछ नतीजे भी अच्छे आए हैं. सरकार सभी ठीक हुए मरीज़ों से प्लाज्मा डोनेट करने की अपील कर रहा है. लेकिन कई वजहों से लोग सामने नहीं आ रहे हैं. ऐसे में गुजरात के अहमदाबाद की रहने वाली सुमिति सिंह जैसे कुछ लोग इसके लिए दूसरों को प्रोरित कर रहे हैं. इलाज के बाद कोरोना वायरस को हराने वाली सुमिति ने अब दूसरे मरीज़ों को बचाने के लिए अपना प्लाज़्मा डोनेट किया है.


सुमिति दूसरे मरीज़ों और इस जंग को लड़ रहे डॉक्टर्स की मदद करना चाहती थीं, लेकिन उनके और उनके परिवार के मन में कई तरह की आशंकाएं भी थी. ठीक वैसी ही आशंकाएं जो कोरोना से ठीक हुए दूसरे लोगों के मन में आ रही हैं. प्लाज्मा में एंटीबॉडी होती है तो कहीं डोनेशन के बाद उनका एंटीबॉडी तो कम नहीं हो जाएगा? डोनेशन का प्रोसेस कहीं जटिल या पेनफुल तो नहीं होगा? निडल से कोई इन्फेक्शन तो नहीं हो जाएगा?


लेकिन डॉक्टर्स ने सुमिति के सभी सवालों का जवाब दिया. उन्हें बताया कि शरीर बहुत-से एंटीबॉडी बनाता है और डोनेशन में ठीक हुए व्यक्ति से सिर्फ उनके एंटीबॉडी का छोटा सा हिस्सा लिया जाता है और ये बहुत कम वक्त में हो जाता है. फिर क्या था. सुमिति डोनेशन के लिए पहुंच गईं. जहां प्लाज्मा डोनेशन का प्रोसेस होता है वो हिस्सा कोरोना मरीज़ों के वार्ड से एकदम अलग होता है. सुमिति बताती हैं कि उन्हें पूरी प्रोसेस में 30 से 40 मिनट का वक्त लगा और उनका 500 एमएल प्लाज्मा लिया गया. इससे पहले सुमिति ने कभी ब्लड डोनेशन नहीं किया था. उनके लिए ये सब नया था. लेकिन वो कहती हैं कि सबकुछ बहुत आसानी से हो गया. कुछ मिनटों के लिए बीच में थोड़ी घबराहट और सरदर्द ज़रूर हुआ था. आसान प्रोसेस सुमिति बताती हैं कि पहले उनका एक ब्लड टेस्ट हुआ, जिससे देखा गया कि उनके शरीर में एंटबॉडी है या नहीं, उनका हिमोग्लोबिन कितना है, एचआईवी और हेपेटाइटिस जैसी कोई बीमारी तो नहीं. सब चीजें ठीक मिलने के बाद उन्हें प्लाज़्मा डोनेट करना था. वो बताती हैं कि उन्हें बस एक सूई लगने भर का दर्द हुआ. उनके शरीर से जो खून निकल रहा था, उसकी ट्यूब एक मशीन में जा रही थी. वो मशीन प्लाज़्मा (पीले रंग का) और खून को अलग कर देती थी. उसके बाद खून को वापस उनके शरीर में भेज दिया जाता था. किसे मिला सुमिति का प्लाज़्मा


कोरोना से ठीक हुए किसी भी व्यक्ति में अगर एंटीबॉडी मिलती है, अब कोई दवाई नहीं चल रही है, कोई और बीमारी नहीं है तो वो प्लाज्मा डोनेट करने के लिए आगे आ सकता है. "मैं यही कहूंगी कि प्रोसेस इतना पेनफुल नहीं होता. अगर आप इतना कर ही चुके हैं तो किसी और की जिंदगी के लिए एक बार और करने में कछ नहीं जाएगा. हम लकी थे कि हम बच गए. लेकिन अब हमारे पास दूसरों की जान बचाने का एक मौक़ा है." सुमिति के घर में उनके माता-पिता और एक बहन हैं. सुमिति इस बात का शुक्र जताती हैं कि उनसे उनके घर वालों को वायरस ट्रांसफर नहीं हुआ था. क्योंकि डब्ल्यूएचओ ने भी कहा है कि इस बात के कोई सबूत नहीं मिले हैं कि एंटीबॉडी डेवलप हो जाने के बाद किसी को दोबारा कोरोना नहीं हो सकता.