रामनामाकंन योग ज्ञान, भक्ति, कर्म का एक ऎसा सामुहिकयोग हैं जिसे अत्यंत- निराला ही योग कहा जा सकता है ।

नाम राम कथा 224
रामनामाकंनम विजयते"
श्रीरामस्वरूपायः श्रीरामनामविग्रहायै नमः।।
तो हमने पढा़ जाना माना कि, 
रामनामाकंन योग ज्ञान, भक्ति, कर्म का एक ऎसा सामुहिकयोग हैं जिसे अत्यंत- निराला ही योग कहा जा सकता है ।
रामनामाकंन योगसाधना में, मैं मैरा का अहंम तरल होकर विरल होजाता हैं। 
रामनामाकंन योग में भक्त का अपना कोई महत्व नहीं बस अपने स्वामी प्रभुराम के नाम का ही महत्व स्थापित होजाता हैं। 
रामनामाकंन योग में कर्म सारा निष्कामकर्म भाव को ग्रहण कर लेता हैं। क्योंकि रामनामाकंन करना कोई कर्म नहीं बल्कि समर्पण हैं। जहां स्वः का समर्पण हैं,उसके साथ ही स्वनाम का ऐसा समर्पण होजाता हैं कि, जैसे उस नामसे कोई नाता ही नहीं हों ?
तो रामनामाकंन योग में,मानोपमान से हटकर किसी अन्य ही जगत में अपनी उपस्थिति अनुभूत करता हैं, जहां प्रेम ही प्रेम का साम्राज्य हैं, जहां मात्र रामनाममहाराज की सत्ता हैं, जहां मात्र और मात्र नाम महाराज की ही शरणमें समस्त देवाधिदेव करबद्ध कतार बद्ध सदैव खडे़ हैं। 
और वो नाममहाराज हैं रामनाममहाराज ।
रामनामाकंन योग धारक को यह सम्पूर्ण जगत रामनाममय ही दृष्ट होने लगता हैं। 
या तो उसकी मति ,
सियाराम मय सब जग जानी।
करहीं प्रणाम जोरि जुग पानी।।
या फिर उसकी दृष्टि में :-
निज प्रभुमय देखहीं जगत, केहिं सन करहीं विरोध। पर स्थिर होजाती हैं।
उसकी निगाह,में नजरिये में, भावों में, ख्यालों में ध्यान में धारणा में बस रामनाम महाराज ही सदा विराजमान हैं। और फिर इस अवस्था को उपलब्ध होजाने पर उसका हर कार्य,हर कर्म,हर शब्द हर गति ,सब रामनाममय होजाती हैं,। उसकी निगाहें रामनाम के दर्शन करती रहती हैं, उसके स्वासें रामनाम का नाॅद करती हैं। और उसके शरीर का एक एक शेल (ग्रन्थि) रामनाममय होती चली जाती हैं।
यह सब होने लगता हैं रामनामाकंन के पुरश्चरणोंपरांत, ।
पर किसी के लिए एक ही पुरश्चरण पुर्ण करने पर इस अवस्था को उपलब्ध हो जाना सहज हैं , तो किसीके लिए पांच सात नो पुरश्चरण भी यदा कदा कम पड़ जाते हैं। 
पर एक भी पुरश्चरण पूर्ण कर लेने वाला रामनामाकंन योगी, निम्नतरयोनियों में भ्रमण करने से सर्वथा मुक्त हो जाता हैं, अर्थात अब उसे कभी भी मानव योनि से निम्नतर योनि में भ्रमण नहीं करना होता हैं, यह श्रीरामनाममहाराज की शरणागति ग्रहणकर सप्रेम रामनामाकंन का एक पुर्श्चरण पूर्ण कर लेने का महात्म्य है। रामनामाकंनयोग का प्रताप हैं।
ज्ञानी को ज्ञान का सूक्ष्म अहंम मिट जाता है,और भक्त का "सबकुछ भगवान का और सबकुछ भगवान ही हैं का भाव आरंभ से नम्रतापुर्वक होता हैं, और कर्मयोगी कुछ भी कर्म करते हुए जगत को सियाराममय जानते हुए समस्त कर्म ही सितारामजी के लिए करता हों तो वो तो सदैव तीनो योग कर्ता तीनो गुणों से परे की सहजावस्था को अनुभूत करने लगता हैं, जिसे संत शास्त्र जीवनमुक्ति कहते हैं।
देखिये,बन्धुओं;-
ज्ञान में अखण्ड आनंद की प्राप्ति होती हैं।
भक्ति में अनन्त आनंद की प्राप्ति होती हैं।
अखण्ड आनंद में ज्ञानी अकेला रहता हैं, तो उस अखण्ड आनंद से उसकी तृप्ति नहीं होती, ‌जैसा कि शास्त्र में कहीमन वर्णन हैं, कि, "एकाकी न रमते". अकेला किसमें रमण करेगा ? अतः अखण्ड आनंद से उसकी अरूची होने पर उसमें अनन्त आनंद अर्थात प्रतिक्षण वर्धमान प्रेमकी पिपासा (प्रेम प्राप्तिकी लालसा) जाग्रत होती हैं। 
दुसराजिजवन मुक्ति का आनन्द भी भोग में ही गिना जाता है। अतः प्रेम अर्थात विशुद्ध वास्तविक प्रेम प्राप्ति ति उसके भी छुटने पर ही अनुभूत हो सकती हैं। 
अतः मोटे रुप में समझे तो इसको यों कहलो ,यों समझ लो कि, 
जीवन मुक्ति का आनंद छूटने का आनंद हैं और प्रेम का आनंद मिलने का आनंद हैं। प्रेमी को मुक्ति भी खारी लगती है।
और एक बात सबको अच्छे से समझ लेना चाहिए कि ,
"* राम ही केवल प्रेम पिआरा""
भगवान भी केवल ओ्रेम के ही भूखे हैं, ज्ञान के भूकजे नहीं हैं, वो तो स्वयं ही ज्ञानके स्वरूप ही हैं तो उनको ज्ञान की क्या भूख, ?
उनका तो स्वरूप ही सतचित आनंद का स्वरूप हैं। चिदानंदमय देह तुम्हारी।
विगत विकार जान अधिकारी।।
अतः सप्रेम राम नामाकंन , प्रेम ही प्रेम जहां दुसरा कोई भाव ही न हों, प्रेम गलि अति सांकरी ता में दो न समाई। केवल प्रेम ही रहता हैं। जहां रामनाम वहाँ प्रेम, और जहां प्रेम वहां, नफरत,नाराजगी,राग,द्वैष,द्वैत, कैसा, किससे नफरत,किससे गुस्सा ?
और वैसे व्यापक विचारों से मनन करो तो भाई अनुभव में आ ही जायेगा कि, वास्तविक अद्वैत तो प्रेम में ही हैं। प्रेम में एक रामनाममहाराज के अतिरिक्त अन्य किसीकी सत्ता ही नहीं हैं, वहां तो बस एक राम नाम ही तो सत्य हैं ? अन्य क्या ? और अन्य कौन ? 
प्रेम में प्रेमी और प्रेमास्पद एक होते हुए भी दो है और दो होते हुए भी एक हैं ।
प्रेमी में अन्य के भाव की स्फुरणा ही नहीं हैं, । अन्यकी तरफ कभी दृष्टि जाती ही नहीं, जायेगी ही नहीं, और जायेगी भी कहां वहां अन्य कोई हैं ही नहीं, एक मात्र अपने प्रेमी के अतिरिक्त ! 
जिधर देखो वहां धरती गगन आकाश,व्योम, छत ,धरा सर्वत्र राम ही राम अंकित दिखाई देता हैं। जित देखहुँ तीत राम राम।‌। 
सीधी सी बात हैं कि, प्रेम में अन्य का अभाव होता हैं, और प्रेमी को तो सारी जगह अपना प्रेमास्पद ही दिखता हैं, ‌ ।
नारद जी ने तो अपने नारद भक्ति सूत्र में एक विलक्षण सूत्र देकर यह समझा दिया हैं कि, 
"अनिर्वचनीयं प्रेमस्वरूपम्। मूकास्वादनवत्।‌।
जब तक अन्यकी सत्ता मानते रहेगें तब तक वह साधन प्रेम-है,साध्य प्रेम (परम प्रेम या परा- भक्ति ) नहीं । इस लिए इसको थोडा समझ लें कि, ज्ञानयोग में अनिर्वचनीय ख्याति हैं, और सप्रेम रामनामाकंनम् में अनिर्वचनीय स्वरूप हैं। 
दुसरे शब्दों में लिखे तो यो समझलो कि, ज्ञान में अन्यका निषेध हैं और प्रेम में अन्य का अत्यन्त अभाव हैं, कारण कि, प्रेम में समग्र परमात्मा की प्राप्ति हैं इस लिए प्रेमी अर्थात रामनामाकंन कर्ता का किसीसे भी बैर विरोध नहीं होता। उसकी दृष्टि में सभी समग्रका अंश होने से किससे कौन बैर करेगा, और क्यों करेगा ? वो तो सब में अपने- राम को देखता हैं।
" निज प्रभुमय देखत जगत केहि सन करहिं विरोध ?
जय जय सियाराम । 
जय रामनामाकंनम्। करना हैं कराना हैं। 
जानना हैं जनाना हैं। मानना है मनाना हैं। बस राम ही राम सर्वत्र।।।


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