सोचो और विचार करो* क्या वाकई इंसान स्वयं बीमार होता है या  डाक्टर उसे बीमार करते हैं कुछ तो है? - कामिनी परिहार

*सोचो और विचार करो*
क्या वाकई इंसान स्वयं बीमार होता है या  डाक्टर उसे बीमार करते हैं कुछ तो है?


सभी अस्पतालों की OPD बन्द है,  आपातकालीन वॉर्ड में कोई भीड़ नही है। कोरोना बाधित मरीजों के ही अलावा कोई नए मरीज नही आ रहे हैं। सड़कों पर वाहन ना होने से दुर्घटनाएं नही हैं। हार्ट अटैक, ब्लड प्रेशर, ब्रेन हैमरेज के मामले अचानक बहुत कम हो गए हैं। 


अचानक ऐसा क्या हुआ है, की बीमारियों की केसेज में इतनी गिरावट क्यों आ गई ? यहाँ तक कि श्मशान में आनेवाले मृतको की संख्या भी घट गई हैं। 


क्या कोरोना ने सभी अन्य रोगों को नियंत्रित या नष्ट कर दिया है?


नही ? बिल्कुल नही ?


दरअसल अब यह वास्तविकता सामने आ रही है, की जहाँ गंभीर रोग ना हो, वहाँ पर भी डॉक्टर उसे जानबूझ कर गंभीर स्वरूप दे रहे थे। 


जब से भारत में कॉर्पोरेट हॉस्पिटल्स, टेस्टिंग लॅब्स की  बाढ आई, तभी से यह संकट गहराने लगा था। मामूली सर्दी, जुकाम और खांसी में भी हजारों रुपये की टेस्ट्स करनें के लिए लोगों को मजबूर किया जा रहा था। छोटी सी तकलीफ में भी धड़ल्ले से ऑपरेशन्स किये जा रहे थे। मरीजों को यूँ ही ICU में रखा जा रहा था। बीमारी से ज्यादा भय उपचार से लगने लगा था। नार्मल डिलीवरी को भी डराकर आपरेशन कर दिया जाता था, 


अब कोरोना आने के बाद यह सब अचानक कैसे बन्द हो गया?


इसके अलावा एक और सकारात्मक बदलाव आया है। कोरोना आने से लोगों के होटल में खाने पर भी अंकुश लग गया है। लोग स्वयं ही बाहर के सड़क छाप और यहाँ तक कि बड़ी होटलों से अधिक घर का खाना पसंद करने लगे हैं।


लोगों के अनेक अनावश्यक खर्च बंद हो गए हैं ? कोरोना नें इंसान की सोच में परिवर्तन ला दिया है। हर व्यक्ति जागृत हो रहा है। *शांति से जीवन व्यतीत करने के लिए कितनी कम जरूरतें हैं, यह अगर वास्तव में समझ में आ रहा हो, तो उसे बीमारियाँ, भोजन, और पैसे की चिंताओं से बहुत हद तक मुक्ति मिल सकती है।*


आज नहिं तो कल  कोरोना पर तो नियंत्रण हो ही जाएगा, पर उससे हमारा जीवन जो आज नियंत्रित हो गया है, उसे यदि हम आगे भी इसी तरह नियंत्रण में रखें, आवश्यकताएँ कम करें,  तो जीवन वास्तव में बहुत सुखद एवं सुंदर हो जाएगा....