• हम रामनामाकंन तो करते हैं पुस्तक में पर सत्य ही वो अंकित होता हैं,

|| नाम-राम-कथा -237 || ||रामनामाकंनायः मूलमंत्रम्, सर्वरोग निवारणाय् || || राम नाम अंकेन् सर्वरोग निवार्णात,महानिर्वाण प्राप्यते् || राम नाम निज औषधि, जी हां, यह राम नाम ,निज की औषधि हैं, यह अलग बात हैं कि, कोई जब तक निजको शरीर ही समझता रहता हैं और रामनामाकंन करता रहता हैं, और जब तक उसको निज का पूरा भान नहीं हो जाता ,तब तक उसके लिए रामनाम महाराज शरीर की औषधि के रूप में भी कृपा कर देते हैं; परंतु यहाँ जो कहा गया,समझाया गया ,उस निज का तात्पर्य स्वयं, अपने-आप से हैं, अपना आत्मा,अपनी चेतना, सब कुछ बाद करने पर , सब कुछ अर्थात, सब कुछ को बाद करने पर जो शेष रहता हैं, वो ही अपना- आप, । उसको ही निज कहा है। यह अति पावन रामनाम महाराज महा कल्याणकारी हैं, यह हमारे अपने आप को जानने,मानने,पहचानने, और अपने-आप को अनुभूत करके ,नर से नारायण, होजाने की औषध हैं, यह आत्मा से परमात्मा होजाने की औषध है । इसको पथ्य सहित सेवन करें तो हर प्रकार की वेदनाओं का सर्वथा निर्वाण हो जाता और आत्मा का तो महानिर्वाण होकर परमधामवासी हो जाता हैं। (जिसके लिए कहा हैं ना ख, :- सो केवल्य परमपद लहहीं।। उस परमपद प्राप्ति के बा्द तो कोई वेदना नहीं रह जाती, हां जब संसार ही नहीं, रह जायेगा, भव ,भावी, नहीं रह जायेगा तो , वेदना किसकी और किसको ? जिस आत्मा ने रामनाम रुपी औषध का पान करके रामात्मा से एकाकारता अनुभूत करली, जिस आत्मा ने परमात्मा से अभिन्नता अनुभूत करली, फिर शेष रहगया क्या ? सब कुछ तो निःशेष:- अतः रामनाम महाराज की शरण होकर सप्रेम रामनामाकंन करते हुए, रामनाम रुपी औषधि का नित्य निरंतर सप्रेम सेवन करते हुए , परम लक्ष्य को सहज प्राप्त करते हुए, प्रत्येक मानव शरीर धारी महा निर्वाण को उपलब्ध हो जाये। इसके लिए ही श्री राम नाम धन संग्रह बैंक ,प्रत्येक मानव को ससंकल्प रामनामाकंन करवा रहा है। इस क्षण भंगुर संसार में ,भले यह परमात्मा का साकार स्वरूप हैं पर इसकी गति इतनी तीव्रतर हैं कि, कोई विरला ही, जो कि रामकृपा प्राप्त होगया हों ? वो ही इसकी गति को समझ पाता हैं और पकड़ पाता हैं, और जो इसकी गति को पकड़ कर थाम लेता हैं, वो ही सदा वर्तमान स्वरुपी साकार स्वरूप धारी परमात्माको पहचान पाता है। देख पाता हैं, वो ही जान पाता हैं कि, पद पाताल सीस अज धामा।। • वरणा मेरे जैसे की दृष्टि तो बीस फीट पर सामने दिखने वाली दीवार से आगे नहीं जा पारही हैं तो ,जिसके पद पाताल में हों और शीष जिसका अज धाम अर्थात सातों अपर- लोकों के पार हों, उसको देख पाना, समझ पाना ,जन्मो जन्मो तक असंभव। बस पढा़ अवश्य हैं और गाया अवश्य हैं कि, पद पाताल........ । • हां पर जा पर कृपा राम की होई, और रामनामाकंन करन लगै तब सोई, तो फिर अवश्य एक दिन उसके जीवन में आता हैं कि, वो रामनाम की औषध ग्रहण करते हुए उस दिव्य दृष्टि को उपलब्ध हो जाता हैं और अर्जुन की तरह परमात्मा के उस पावन दिव्य स्वरूप, उस विराट स्वरूप के दर्शन करने में सक्षम हो जाता है। • पर परमादरणीय रामनामाकंन कर्ता भक्तों आपका लक्ष्य तो मात्र उस विराट के दर्शन मात्र ही नहीं हैं, बल्कि आपका परम लक्ष्य हैं, राम को जान कर रामाकार ही हो जाना। रामनाम की औषधि ग्रहण करते हुए भव व्याधि से सदा सदा के लिए मुक्ति । • बस यह मात्र रामकृपा से ही संभव हैं और आज हमारे सामने ,रामनाम रूपसे स्वयं रामजी सदैव साथ हैं ,रामनामरूप से उनकी कृपा बरसने को तत्पर हैं, तो हमें उस कृपा का लाभ लेते हुए, रामनामाकंन करते हुए रामाकार होजाना हैं। • रामनामाकंन करते करते हमें सारा संसार सियाराम मय दृष्ट होने लगें। सबमें सबके घट में विराजमान भगवान पारब्रह्म परमेश्वर परमात्मा राम अनुभूत होने लगे, तो जीवन मोक्ष का आनंद भी अनुभव में आ जायेगा। • सियाराम मय जगत के दर्शन प्रेम के प्रकटीकरण से होते हैं, ज्ञान से नहीं, कर्म से नहीं, बस रामनामाकंन करते करते रामनामानुराग उत्पन्न होता हैं, रामनामानुराग के उत्पन्न होने परांत तो कुछ भी असंभव नहीं । • स्वार्थ परमार्थ सुलभ रामनाम के प्रेम , तो रामनामानुराग से राम नाम प्रेम और रामनाम प्रेम से तो ,सारे लौकिक स्वार्थ की पूर्ति भी और परमार्थ की पूर्ति भी, जीवन मोक्ष भी और कैवल्य मोक्ष भी। • जय हो ऎसे रामनाम महाराज की शरणागति की। जय हो ऎसे सहज सरल,सर्वत्र सुलभ रामनाममहाराज की, जिनकी अहेतु कृपा सब पर बरसने को तत्पर और तैयार हैं, बस हमें ही सप्रेम ससंकल्प शरणागत होना हैं। और रामनाम जो करना हैं और वो भी अति अल्प समय हमारे हाथ में हैं,उसमें ही करना हैं अतः रामनाम जप को‌ लिखित रूप से जप करना हैं जो कि अलप समय में भी हमें पुर्णता प्रदान कर सके। मारवाड़ी में कहावत हैं कि, सो बक और एक लख;- तात्पर्य हैं कि, सो बार कहना याद‌ दिलाना और सो बार याद करना उससे तो एक बार लिखा हुआ कभी विस्मृत नहीं हो पाता, तो रामनाम को भी लिखित रुप से जप करके इस ब्रह्मांड के सीने पर अमित छाप छोड़ते हुए आगे बढे़। • हम रामनामाकंन तो करते हैं पुस्तक में पर सत्य ही वो अंकित होता हैं, विश्वस्वरूप परमात्मा के ही सीने पर। अतः हमने एक बार भी अंकित किया वो अमिट रूप से अंकित होता जाता है। तो आओ रामनाम महाराज की शरण होकर अंकित करते हुए रामनाम जपें। रामनाम की उस ओरम पावन औषध का सेवन करें। जिससे सदा सदा के लिए समस्त वेदनाओं से मुक्त होकर, परमानन्द को उपलब्ध हो जायें। जय जय सियाराम । जय जय रामनामाकंनम्। 9414002930. Bk 8619299909 •


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