कोरोनाकाल विशेष - "प्रार्थना" ईश्वर प्राप्ति का श्रेष्ठ माध्यम - श्रीमती सरिता सोनी


जोबठ-कोरोनाकाल में सारी दुनिया आशंकित एवं हर से ईश्वर की ओर रहम की नजर से देख रही है, और अपने आप को बचाने हेतु अलमन से लगातार प्रार्थना कर रही है । इस अवसर पर जोबट निवासी श्रीमती सरिता विजय सोनी ने अपने उद्गार इस रुप में व्यक्त किऐ उन्होने बताया कि, “दुनिया के समस्त धर्मो में प्रार्थना को विशेष महत्व दिया गया है । प्रार्थना को शरीर एवं आत्मा का भोजन माना गया है । सच्चे मन से हर परिस्थिति एवं हर समय में ईश्वर से की गई प्रार्थना स्वीकार होती है । ईश्वर प्राप्ति के लिऐ की जाने वाली पूजा, मंत्र, जप, ध्यान आदि सभी प्रकार की पध्दतियों में सबसे सरल एवं श्रेष्ठ माध्यम है-प्रार्थना । ईश्वर के साथ एकाकार होने के लिए मदद के रुप में प्रार्थना को विशेष महत्व दिया जाता रहा है । वर्तमान समय में मनुश्य अषान्ति, मुष्किलों एवं विविध प्रकार के कष्टों का सामना कर रहा है । सबको सुख और शान्ति चाहिए, इसे लिऐ वह अनेक बार अंधश्रध्दा के वशीभूत होकर अंधविष्वास के मार्ग पर चल देता है जिसके भयानक परिणाम भुगतना पडते है । जीवन में हर व्यक्ति अनेक प्रकार की मुष्किलों का सामना करते हऐ उससे बाहर निकलने के लिए अनेक प्रकार के उपाय करता है इन सब उपायों में सबसे सरल एवं असरदार उपाय है- प्रार्थना कठिन से कठिन एवं असम्भव लगने वाला कार्य भी प्रार्थना से संभव है परन्तु प्रार्थना मात्र व्यक्तिगत स्वार्थ की पूर्ति के लिए नहीं, अपितु समस्त जीवों के कल्याण हेतु करना चाहिए, जिसमें समपर्ण का भाव होना चाहिए सच्च्चे मन से की गई प्रार्थना को ईश्वर जरुर पूरी करता है, जैसे-जैसे हम प्रभु की ओर जाते है, हमारे मन मस्तिश्क को शान्ति प्राप्त होती है तथा हमारी निराशा आशा में बदलती जाती है । शरीर में सकारात्मक उर्जा का प्रवाह होने से शरीर निरोगी रहता है, साथ ही वातावरण भी पवित्र होता है । हमारे धर्म ग्रन्थों में ईश्वर का कण-कण में व्याप्त माना है, इसलिए हम सूर्य, चन्द्रमा, प्रकृति, वनस्पति, वृक्षों जीव-जन्तुओं आदि की प्रार्थना करते है जिस प्रकार शरीर के पोशण हेतु भोजन की आवष्यकता होती है वैसे ही प्रार्थना को शरीर एवं आत्मा का भोजन माना गया है । प्रातःकाल एवं सांयकाल प्रार्थना अवष्य करना चाहिए । अतआत्मा से की गई प्रार्थना से मन पवित्र होता है तथा विचारों में सकारात्मकता एवं शुध्दता आती है शरीर स्वस्थ रहता है तथा मनोविकार नश्ट होते है, जिससे व्यक्ति विनम्र एवं विनयषील बनता है जो कि वास्तव में व्यक्ति की स्वाभाविक आवष्यकता है । महात्मा गांधी कहते थे कि, प्रार्थना धर्म का निचोह है प्रार्थना याचना नहीं बल्कि यह तो आत्मा की आवाज है, जिससे आत्मशुध्दि होती है और विनम्रता आती है । इसलिए हर विद्यालय, विचार संगोश्टीयों, कार्ययालाओं आदि मे प्रार्थना कर वातावरण को निर्मल एवं पवित्र बनाया जाता है ।


___ प्रार्थना व्दारा ईष्वर तक पहुंचाने हेतु अपने आराध्यदेव पर पूर्ण निश्ठा, विष्वास, सकारात्मक भाव, षान्त मन एवं विचार के साथ उसमें इष्वर की छबि होना चाहिए । प्रार्थना के दौरान निम्न बातों का ध्यान रखना आवष्यक है :1- प्रार्थना ईष्वर तक पहुंचाने हेतु स्वयं में नम्रता होना जरुरी है । विनम्र भाव से ईष्वर का ध्यान करने से प्रार्थना में इष्वर की शक्ति आती है । जब तक स्वयं के ज्ञान एवं शक्ति पर नाज रहेगा तथा भक्ति का दिखावा रहेगा तब तक ईष्वर की प्राप्ति संभव नहीं हो सकती है 2- अपने आराध्य के विषेशताओं को ध्यान में रखकर उसके स्वरुप पर पूर्ण विष्वास होना चाहिए तभी आपकी प्रार्थना सफल होगी । 3- प्रार्थना के दौरान अपना पूरा ध्यान अपने आराध्य पर लगाएं, तभी आपकी प्रार्थना की सार्थकता है 4- प्रार्थना के दौरान एकाग्रता होना चाहिऐ, मन स्थिर एवं शान्त होना चाहिए तथा प्रार्थना के दौरान किसी भी प्रकार की इच्छा, आवेश एवं सन्तुश्ठि का भाव नहीं होना चाहिए । जब तक भटकाव रहेगा आपकी प्रार्थना सफल नहीं होगी ।


प्रार्थना की शक्ति


एक साधु भगवान कृष्ण का अनन्य भक्त था । वह वृन्दावन में हर समय भगवान की भक्ति में लीन रहकर घन्टों भगवान की मूर्ति के सामने खड़े होकर उसको निर्वीकार निहारता रहता था । परन्तु उसकों भगवान ने दर्शन नहीं दिए । एक बार तो भक्त का धीरज जवाब दे गया और हताशा में वह भगवान की मूर्ति के सामने खड़े होकर चिल्ला चिल्ला कर बोलने लगा की शायद मै बहुत ही बड़ा पापी हूं जिससे इतनी उपासना करने के बाद भी भगवान मुझे दर्शन नहीं दे रहे है इससे तो अच्छा है कि मैं अपने प्राण त्याग दूं । इतना विचार आते ही वह रात में अपने घर से बाहर निकलकर यमुनाजी की ओर चल दिया उसके मन में यह निर्णय कर लिया था कि आज मैं यमुनाजी की पवित्र धाराओं में अपने प्राण त्याग दूंगा इतना विचार करते करते वह यमुनाजी की ओर बढ़ रहा था । इतने में एक कोढी व्यक्ति ने उसके पैर पकड लिऐ । वास्तव में उस कोढी व्यक्ति को भगवान श्रीकृष्ण ने स्वप्न में बताया था कि कुछ देर बाद एक भक्त यहां से निकलेगा और उसको तुम कहना कि, वह तुम्हारा कोढ दूर कर दें ।कोळी द्वारा आत्महत्या करने जा रहे व्यक्ति के पैर पकडने पर भक्त बोला कि मुझ जैसे अभागन के पैर क्यो पकडते हा, किसी साधु सन्त महात्मा के पैर पकडो तो तुम्हारा कल्याण होगा । परन्तु कोढी बार बार मिन्नत करने लगा कि "मेरा कोढ दूर कर दो, तुम प्रभु से प्रार्थना करोगे तो मेरा कोढ अवष्य दूर हो जाऐगा ।“ तब भक्त ने कहा - भाई अगर ऐसा होता तो आज में अपने प्राण त्यागने यमुनाजी में नहीं जाता रहा होता । मैं कई सालों से लगातार भगवान श्रीकृष्ण की आराधना कर रहा हूं परन्तु उन्होने आज तक मुझे दर्शन नहीं दिए तो आज मेरी बात कहां से मान लेगें । मुझे जाने दो । परन्तु कोढी बार बार मिन्नत करने लगा कि बस एक बार सच्चे मन से मेरे लिए प्रार्थना करके भगवान से कह दो कि मेरा कोळ दर हो जाएं । इसके बाद आपको कछ नहीं करना है मैं आपके पैर छोड़ दूंगा । हार मानकर भक्त ने बड़े ही करुणामय तरीके से भगवान का स्मरण कर प्रार्थना की और कहा कि- हे बषीधर इस कोढी का कोढ दूर कर दो इसके आगे बस मुझे कुछ नहीं चाहिए , इतना कहते ही कोठी का कोढ दूर हो गया । देखते ही देखते उसका शरीर निरोगी होता चला गया । यह देखकर भक्त भी आष्चर्य में पड़ गया उसने यमुनाजी में प्राण त्यागने का विचार त्याग दिया और फिर से अपने घर में आ गया । रात भर उसको नींद नहीं आई वह सुबह होने का इन्तजार करने लगा । सुबह होते ही वह जल्दी से तैयार होकर मन्दिर की ओर भगवान के दर्षन करने चल पडा मन्दिर पहुंचकर उसने देखा कि भगवान की मूर्ति उसको देखकर मुस्करा रही थी । भक्त ने हाथ जोडकर कहा किहे गोपाल, ये तुम्हारी कैसी लीला है मैने तुम्हारी इतने वर्श सेवा की और तुमने मुझे दर्षन नहीं दिये और आज मेरी प्रार्थना करते ही मेरा उद्दार कर दिया । तब भगवान ने कहा कि, तुमने इतने वर्श तक मेरी सेवा की पर कभी कुछ मांगा ही नहीं ,पहली बार तुमने एक कोढी व्यक्ति को ठीक करने के लिए प्रार्थना की, क्योकि तुम्हारी आराधना से तुम्हारी प्रार्थना में ज्यादा शक्ति है । इसलिए तुम्हारी बात मान ली गई । इस प्रकार भक्त अनवरत् रोने लगा तथा उसको प्रार्थना की शक्ति का अहसास हो गया था कि प्रार्थना ईष्वर की सर्वोपरी भक्ति है


प्रार्थना का सही तरीका -


अपने इश्टदेव, प्रकृति अथवा देवी देवता के समक्ष प्रार्थना करने से तन एवं मन को शान्ति मिलती है । प्रार्थना हेतु मन्दिर, घर अथवा एकान्त का होना ज्यादा उपयुक्त माना गया है । प्रार्थना खड़े रहकर, दोनो हाथ जोडकर, ध्यान मुद्रा में बैठकर, मन मस्तिश्क को शान्त कर शरीर को शिथिल रखकर आंखे बन्द कर अपना सम्पूर्ण ध्यान अपने आराध्य पर केन्द्रित करना चाहिए । हर दिन दस से पन्द्रह मिनट प्रार्थना करने से मन शान्त और शरीर उर्जामय हो जाता है एक बात जरूर ध्यान रखना चाहिए कि प्रार्थना में नम्रता एवं समपर्ण भाव होना चाहिऐं । इसलिए प्रार्थना मात्र व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए नहीं करके अपितु सारे संसार के कल्याण हेतु करना चाहिऐं ।


सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः ।


सर्वे भद्राणी पश्चन्तु, मां कश्चिति दुःखभाव भवते ।


श्रीमती सरिता विजय सोनी


69, सातुलाल कॉलोनी,


जोबट जिला-अलिराजपुर


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