बाबा सूरदासजी ने सहज समाधि की अवस्था का सम्पूर्ण विवरण अपने भजन में गा दिया,

नाम राम कथा 195


राम नाम अंकन धुन लागे।
सकल बासना मन ते भागे।।
राम स्वयं अपने घट जागे।
सहज हों सहज समाधि सागे।। bk
गतांक से आगे:-
साधो सहज समाधि भली।।।।
तो बाबा सूरदासजी ने सहज समाधि की अवस्था का सम्पूर्ण विवरण अपने भजन में गा दिया, और महर्षि जी ने सहज समाधि में कैसे स्थित हों, बताया, उसकी बारीकीयां और कैसे राम नाम अंकन होने लग जाये, कैसे मानसपाठ करते करते सहजता में स्थित हों जाएं और कैसे सोते जागते भी वही समाधि अवस्था की उपलब्धता सदैव बनी रहे, इसकी चर्चा कल के लेख में करवाई।,
आज भी वही क्रम आगे बढता हैं कि, 
मन में सकल वासना तब तक रहती हैं,जब तक करने का भाव जाग्रत रहता हैं, क्रिया भाव में "मैं "प्रगाढ़ रहता हैं, क्रियमाणता, जब सप्रेम रामनामाकंन करते करते अक्रियता में परावर्तित होजाती हैं, तब काज,कारण,करण गौण होकर के, विलक्षण सहजता जाग्रत हो जाती हैं, और आत्मतत्त्व और रामतत्त्व की अभिन्नता अनुभव में आती हैं, जो हमारी चेतना यात्रा की प्रधान मंज़िल हैं।
प्रत्येक जीवात्मा का परमलक्ष्य हैं, जिसके बिना जिवात्मा को आनन्द की उपलब्धि नहीं हो सकती हैं, और उसी आनंद की प्राप्ति, हेतु जीवात्मा जनम जनम यत्न कर रहा हैं, और नाना प्रकार के सकल जंजालों में खोज रहा हैं।
रात दिन भाग दोड़ ,करते हुए भी उस आनन्द की झलक से वंचित हैं, उसके प्रतिबिंब के भी प्रतिबिंब की हल्कि सी झलक यदा कदा छण भर के लिए किसी सकल मनोभाव में पा जाता हैं, तो उसे अपनी उपलब्धि मानकर अपनी अहंमता को और मजबूत करते हुए और अटकने के प्रयास में लग जाता हैं।
यह भाग दौड बन्द करके, अभी "लोकडाउन ". (22-3-2020 to 31-3-2020);के समय घर रहने का जो समय परमात्मा ने प्रदान किया उसमें कोरोना को छोड़ राम नाम अंकन करोगेना तो , वो सब कुछ जो कि, "परम हैं"स्वतः अपने पास आ जायेगा।


जैसा कि एक संत ने समझाया कि, निरर्थक दौड़ लगाते रहने से कुछ नहीं मिलने वाला, जो मिलने वाला हैं वो तो अभी भी इसी वक्त तेरे पास ही हैं।
दौड़ सके तो दौड़ ले, जब लगि तेरी दौड़।
दौड़ थक्यां धोखा मिट्या,वस्तु ठौड़ की ठौड़।।
तो अक्रियता में जो सामर्थ्य हैं वो क्रिया में क्रियमाणता में नहीं ।
मौन रहने में जो सामर्थ्य हैं,वो बोलने में नहीं ।
कुछ नहीं करने में जो सामर्थ्य हैं वो करने में नहीं ।
अतः सहजता में जो सामर्थ्य हैं वो असहजता में नहीं ।
नहीं पाने के भाव मेंजो सहज सहजता हैं वो पाने,करने,कराने के भाव में नहीं, औरकभी भी हो ही नहीं सकता।
अक्रियता वास्तव में हमारे आत्मा व परमात्मा की सहज स्थिति हैं,तो हमको राम नाम अंकन करने के भाव से नहीं करना हैं बल्कि क्रियमाणता से अक्रियता में अवस्थित होने हेतु करना हैं। 
क्योंकि जब तक दौड़ने का भाव प्रगाढ़ रहेगा,उस को कितना ही विश्राम और परम बिश्राम के गुणगान सुनादो, वो तो दौड़ कर ही मानेगा; परंतु जब दौड़ लगाते लगाते थक कर चूर चूर होकर गिर पडे़गा तब उसको विश्राम का अनुभव होगा,और उस विश्राम की अवस्था को वह सही से अनुभव करले तो परम विश्राम भी पा लेगा। 
गोस्वामी जी ने राम नाम के अंकन को मानसके रूपमें अंकित करना आरम्भ किया, और क्यों किया ? " विश्रामके' लिए, और जब पूरी राचमानस में प्रत्येक चौपाई दोहे को रामनाममय करके अंकित कर दिया तब अंत में जो मिला वो भी लिख दिया,कि, """""पायो परम विश्राम"""।।
आरम्भ में अपनी इच्छा व्यक्त की कि, मैं यह राम नाम को राचमानस के रूपमें "स्वातंसुखाय ' के लिए लिख रहा हूं, और तब तक लिखता रहुंगा जब तक परम बिश्राम में अवस्थित नहीं हो जाता। 
और जब पायो परम विश्राम " तब मानस को आगे नहीं लिखा, और लिखनेकी आवश्यकता भी नहीं रहगयी। अन्यथा लव कुश काण्ड लिखते हुए और आगे बढाया जा सकता था, पर बस जहाँ परम विश्राम को उपलब्ध हो गये तो फिर ........?
राम नाम अंकन तब तक करते रहना हैं जब तक सहजावस्था को उपलब्ध नहीं हो जायें, ? बस एक बार उसकी झलक मिल जाये तो जनम जनम की साधना पूर्ण हो जायेगी, वो एक क्षण साधक के जीवन में जितना जल्दी अनुभव में आजाये बस।
तो सहज होने को एक नाम को धारण कर लेना हैं, और वो हैं नाम"राम" ।।‌
और एक ही ठाम पर बैठ जाना हैं। 
ठाम का तात्पर्य हैं स्थान, या धाम, ।


तो कहा हैं कि


सहजां मारग सहज का,सहज पाये विश्राम।
हरेक जीव अरु सीव का,एक नाम अरू ठाम।।
तो रामनामाकंन सहज हैं,
रामनामाकंन को सहजता से अपनाते हुए, परम विश्राम ,परम धाम,परम सहजावस्था को उपलब्ध होना सहज है।
अतः रामनामाकंनम्।
जयति रामनामाकंनम्।
रामनामाकंनम विजयते।।।


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