कोरोना वायरस की महामारी के कारण अपने प्रियजन को अंतिम विदाई देने का मौक़ा भी इटली के लोगों पास से छिन गया है.

इटली में कोविड 19 के कारण मरने वाले कई लोगों के पास आखिरी वक्त में उनके परिवार का कोई सदस्य या कोई मित्र नहीं था. उनसे किसी दूसरे को संक्रमण न फैले इसलिए अस्पताल में लोगों के उनसे मिलने आने पर भी पाबंदी लगाई गई थी. इसका मतलब ये है कि शव को तुरंत सील किया जाना ज़रूरी है. लेकिन इटली में अभी कोरोना से मरने वालों का अंतिम संस्कार उनके पसंदीदा कपड़ों में नहीं किया जा सकता. उन्हें अस्पताल के ही गाउन में चुपचाप दफनाया जा रहा है.


जब कोई ऐसे व्यक्ति की मौत हो जाती है, जिसे आप प्यार करते हैं तो उसे आखिरी बार देखना और उसे पूरे सम्मान के साथ विदा करना आपके लिए सबसे जरूरी हो जाता है. लेकिन कोरोना वायरस की महामारी के कारण अपने प्रियजन को अंतिम विदाई देने का मौक़ा भी इटली के लोगों पास से छिन गया है. ये एक तरह से मृतक को दिए जाने वाला सम्मान छीनने और परिवार के लोगों का दुख बढ़ाने जैसा है. एंड्रीया सेराटो मिलान में एक फ्यूनरल होम में अंडरटेकर का काम करते हैं. वो कहते हैं, "महामारी आपको एक बार नहीं दो बार मारती "पहले ये बीमारी मरने से ठीक पहले आपको अपने सभी प्रियजनों से अलग-थलग करती है. फिर ये किसी को आपके पास आने नहीं देती. परिवारों के लिए ये बेहद मुश्किल समय होता है और उनके लिए ये स्वीकार करना दुखदायक होता है." अकेले में मौत का आना'उनके पास भरोसा करने के सिवा दूसरा रास्ता नहीं है' इटली में महामारी के दौर में अंडरटेकर खुद को एक नई भूमिका में देख रहे हैं. वो मृतक के परिजन की तरह, उनके मित्र की तरह काम कर रहे हैं. वो एक पादरी की तरह मृतक के लिए जन्नत की प्रार्थना कर रहे हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि कोरोना से मरने वाले अधिकर मामलों में उनके परिवार के सदस्य क्वारंटीन में होते हैं. एंड्रीया सेराटो कहते हैं, "परिवार के लिए इस वक्त में उनकी सारी ज़िम्मेदारी हम ही निभाते हैं." सेराटो कहते हैं, "हम परिवार वालों के पास ताबूत की एक तस्वीर भेजते हैं और इसके बाद अस्पताल से शव को लेकर दफना देते हैं. परिवार वालों के पास हम पर यक़ीन करने के सिवा कोई रास्ता नहीं है." मरने वाले के प्रति संवेदना सेराटो बीते 30 सालों से अंडरटेकर का काम कर रहे हैं. उनसे पहले उनके पिता भी यही काम करते थे. वो मानते हैं कि मरने वाले के परिवार के लिए छोटी-छोटी बातें भी मायने रखती हैं. वो कहते हैं, "आखिरी बार उनके गालों को सहलाना, उनका हाथ पकड़ना, और उन्हें खूबसूरत दखना. ऐसा नहीं कर पाना अपने आप में दर्दनाक है." लेकिन महामारी के इस दौर में सेराटो जैसे कई लोग परिवारों से दूरी बना कर ही मुलाकात करने के लिए बाध्य हैं. मृतक के रिश्तेदारों की ये कोशिश रहती है कि वो मृतक के लिखे नोट्स, परिवार की निशानी, चित्र और कविताएं शव के पास रखें, ताकि ये उनके साथ ही दफनाए जा सकें. अगर किसी व्यक्ति की मृत्यु घर पर हो जाती है, तो अंडरटेकर को घर के भीतर जाने की अनुमति होती है - लेकिन उन्हें पूरी तरह से सेफ्टी गियर पहनकर आना होत है, जैसे - चश्मा, मास्क, दस्ताने और कोट. किसी भी इंसान के लिए अपने प्रियजन को मरते देखना बहुत दुखदायी होता है. जनाज़ा निकालने पर प्रतिबंध दिन में कम से कम एक बार ऐसा होता है जब सेराटो किसी शव को दफनाते हैं और कोई परिजन आसपास नहीं दिखता, क्योंकि हर कोई क्वारंटीन में है. मसिमो कहते हैं कि वो जितना संभव हो सके इस तरह की स्थिति से बचने की कोशिश करते हैं. वो अपनी कार में ताबूत लेकर चर्च पहुंचते हैं और कार के पीछे का दरवाज़ा खोल कर पादरी से गुज़ारिश करते हैं कि वो वहीं पर मृतक के लिए प्रार्थन करें. इसके बाद कुछ ही सेकंड में वो शव को क़ब्रिस्तान या शवदाह गृह ले जाते हैं और फिर इसके बाद वो अगला शव लेने के लिए निकल पड़ते हैं.


इटली में ताबूत ही ताबूत



इटली में स्थिति फ़िलहाल ऐसी है जहां मुर्दाघर शवों से भर गए हैं और मरने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है. यहां 23 मार्च के बाद से अब तक कोरोना वायरस के कारण छह हज़ार लोगों की मौत हो चुकी है जो किसी भी देश से अधिक है. सेराटो कहते हैं, "क्रेमोना में हमारे फ़्यूनरल होम के बाहर लोगों की कतार है. ये कुछ-कुछ सुपरमार्केट की तरह है." एक के बाद एक ताबूत चर्च में आ रहे हैं. इटली में सबसे अधिक मामले बर्गेमो में दर्ज किए गए हैं जहां मदद के लिए सेना को बुलाना पड़ा है. यहां शहर से सभी कब्रिस्तानों में जगह कम पड़ रही है. पिछले सप्ताह एक रात सेना के ट्रकों में 70 से अधिक ताबूतों को शहर की गलियों से होते निकाला गया. स्थानीय लोगों ने चुपचाप ये नज़ारा देखा. इनमें से हर ताबूत में किसी के मित्र या रिश्तेदार का शव था जो नज़दीकी शहर में दफ़नाने के लिए ले जाया जा रहा था. इस मुश्किल परिस्थिति में इटली में डॉक्टरों और नसों को तो जान बचाने वाले हीरो की तरह देखा जा रहा है.फ़िलहाल यहां उम्मीद की किरण नहीं दिखती. सभी की प्रार्थना यही है कि ये दौर जल्द गुज़र जाए और सब कुछ पहले की तरह सामान्य हो जाए, लेकिन ऐसा कब तक हो पाएगा ये किसी को नहीं पता. रेखांकन: जिलिया डिस्टमैलची


 


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