कोरोना वायरसः पुरुषों के मुकाबले महिलाएं ज़्यादा जोखिम में हैं


कोरोना वायरस के फैलने के दौरान क्या महिलाओं की जिंदगियों को गंभीरता से लिया जा रहा है? महिलाओं को अस्पतालों में अक्सर खराब फिटिंग वाले इक्विपमेंट्स के साथ काम करना पड़ता है जो कि मूलरूप में पुरुषों के लिए बने होते हैं. घर पर महिलाओं को बड़े-बुजुर्गों और बीमार रिश्तेदारों की देखभाल करनी होती है, साथ ही बच्चों की पढ़ाई का भी ध्यान रखना होता है. ऐसे वक्त में जबकि पूरी दुनिया कोविड-19 से जंग लड़ रही है, क्या महिलाएं पुरुषों की तरह ही सुरक्षित हैं या उनके स्वास्थ्य को जोखिम में डाला जा रहा है?


क्या महिलाएं फ़ैसले लेने की प्रक्रिया में पूरी तरह से शामिल हैं? इस बहस में अब एक्टिविस्ट्स और दूसरे सामाजिक संगठन भी जुड़ गए हैं. इनका कहना है कि वे इस बात से परेशान हैं कि बीमार रिश्तेदारों और बूढ़े मां-बाप की देखभाल की ज़्यादातर ज़िम्मेदारी महिलाओं के ऊपर आ गई है. घरों में कैद बच्चों के मनोरंजन और उनकी पढ़ाई की फ़िक्र करना भी महिलाओं के ही ज़िम्मे है. ऐसा उन मामलों में भी है जहां महिलाएं फुल-टाइम नौकरी घर से कर रही हैं. हॉस्पिटलों और दूसरे स्वास्थ्य केंद्रों में मौजूद महिला स्वास्थ्यकर्मियों का कहना है कि उन्हें अक्सर उनके शरीर पर फ़िट न बैठने वाले इक्विपमेंट्स के साथ काम करना होता है. ऐसा इस वजह से है क्योंकि इन सामानों को पुरुषों के शरीरों के आकार को दिमाग में रखकर बनाया गया होता है.


महिलाओं की फ़िक्र कौन कर रहा है? रड ने कहा, "मैं चाहती हैं कि फैसले लेने की प्रक्रिया में ज़्यादा महिलाओं को शामिल किया जाए." रड यह देखकर हैरान हैं कि कितनी कम महिलाओं को सरकार की सबसे उच्चस्तरीय बैठकों में हिस्सा लेने का मौका मिल रहा है. उन्होंने ट्वीट किया, "बराबरी का मतलब है बेहतर फैसले करना. संकट के वक्त महिलाओं को दूर मत करिए." उनके इस ट्वीट के तुरंत बाद सोशल मीडिया पर एक तीखी बहस छिड़ गई. रड ने बीबीसी को बताया, "विविधता का भी मतलब है बेहतर फैसले करना. मेरे अनुभव के हिसाब से केवल महिलाएं ही महिलाओं की जिंदगियों से जुड़े हुए मसलों को उठाती हैं."


वित्तीय रूप से सबसे तगड़ी चोट महिलाओं पर क्रियाडो-पेरेज़ के मुताबिक, "और इसके वित्तीय दुष्परिणाम भी हैं." वह कहती हैं, "सर्विस सेक्टर में महिलाओं के सबसे ज़्यादा नौकरी करने के आसार होते हैं. इसी सेक्टर पर महामारी की सबसे बुरी मार पडी है." वह पूछती हैं, "महिलाओं के असुरक्षित या ज़ीरो-ऑवर कॉन्ट्रैक्ट्स में होने की आशंका ज़्यादा होती है और इनके पास वैधानिक सिक होने की कम उम्मीद होती है. हमारे पास ऐसी पॉलिसीज कहां हैं जिनमें इन चीज़ों को हल किया गया हो?" उनके मुताबिक़, "इतिहास गवाह है कि अगर आप महिलाओं को फ़ैसले लेने की प्रक्रियाओं में शामिल करते हैं तो इन चीज़ों के समाधान निकाले जाने की ज़्यादा उम्मीद होती है."


लिंग और मृत्यु दरअभी तक के पूरी दुनिया के आंकड़े बता रहे हैं कि कोविड-19 से महिलाओं के मुक़ाबले पुरुषों के मरने की ज़्यादा आशंका है. लेकिन, क्रियाडो-पेरेज़ का कहना है कि लॉन्ग-टर्म में ज़्यादा महिलाएं इससे बुरी तरह से प्रभावित होंगी.


गोरे पुरुष का असर और विविधता की बात कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में साइकोलॉजिस्ट और विचारों और फ़ीलिंग्स के व्यवहार पर एक एक्सपर्ट डॉ. सिमोन श्नाल कहती हैं, "महिलाओं में जोखिम से बचने का ज़्यादा रुझान होता है साथ ही वे पुरुषों के मुक़ाबले गंभीर ख़तरों ज़्यादा देख पाती हैं."


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