प्रशंसा मनुष्य को उदार बनाती है।

(राकेश कुमार शौणडिक -  राँची /झारखंड)
         प्रशंसा मनुष्य को उदार बनाती है। यदि हमारे अंदर दूसरों का मनोबल बढ़ाने की प्रवृत्ति है, अक्सर छोटी-छोटी बातों पर भी दूसरों को सराहने की प्रवृत्ति है तो ऐसी प्रवृत्ति हमारे जीवन को और अधिक उदार बना देती है।


        अगर जीवन में कभी जैसा आप सामने वाले से अपेक्षा करते हैं अथवा आपने मन के अनुरूप कोई कार्य न भी हुआ तो क्रोधित होने की अपेक्षा अथवा तो नकारात्मक टीका- टिप्पणी करने की अपेक्षा उसके सकारात्मक पहलू पर विचार करो और प्रशंसा के दो शब्द बोल दिया करो। आपके द्वारा की गई सामान्य प्रशंसा भी सामने वाले के मनोबल को और अधिक मजबूत बना सकती है। आपके द्वारा की जाने वाली सहज प्रशंसा भी कभी-कभी सामने वाले के लिए प्रसन्नता का कारण बन सकती है।


         किसी कार्य से प्रभावित होकर प्रशंसा करना अलग बात है लेकिन किसी कार्य का आपके अनुरूप न होने पर भी प्रशंसा करना बिल्कुल अलग बात। प्रशंसा दूसरों के प्रभाव से नहीं आपके स्वभाव में होनी चाहिए, यही तो आपकी उदारता का भी पैमाना है। एक बात और प्रशंसा, प्रसन्नता की जननी है। आप भी खुश रहो और दूसरों को भी खुश रखो!
 


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