शिवराज’ ‘ज्योतिरादित्य’ और ‘कमलनाथ’ के इर्द-गिर्द घूमती सियासत - अरुण पटेल - लेखक सुबह सवेरे के प्रबंध संपादक हैं। -  - शाभार दैनिक सुबह सवेरे

‘शिवराज’ ‘ज्योतिरादित्य’ और ‘कमलनाथ’ के इर्द-गिर्द घूमती सियासत


- अरुण पटेल
- लेखक सुबह सवेरे के प्रबंध संपादक हैं।



मध्यप्रदेश के इतिहास में पहली मर्तबा 24 विधानसभा क्षेत्रों में उपचुनाव की परिस्थितियां पैदा हो गयी हैं और चुनाव परिणाम तक प्रदेश की सियासत मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान, ज्योतिरादित्य सिंधिया तथा प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष व पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ के इर्द-गिर्द घूमती रहेगी। उपचुनाव परिणाम के नतीजे क्या होंगे उसके मुख्य किरदारों की भूमिका में शिवराज, ज्योतिरादित्य और कमलनाथ ही होंगे, क्योंकि मतदाताओं के सामने ये तीन चेहरे होंगे और 22 दलबदलू विधायकों की चुनावी वैतरणी पार लगेगी या नहीं यह इनके अपने-अपने करिष्में पर निर्भर करेगी। जहां तक शिवराज का सवाल है चैथी बार प्रदेश की कमान संभलाते ही उन्हें अकेले वन-मैन आर्मी की तरह चुस्ती-फुर्ती, मुस्तैदी तथा दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति के साथ विष्वव्यापी कोरोना महामारी की जंग में कूदना पड़ा। जब उन्होंने सत्ता की बागडोर संभाली तो उनके सामने केवल यही अकेली चुनौती नहीं थी बल्कि उनके सामने और भी अनेक चुनौतियां मुंह बाये खड़ी हैं। पहली चुनौती है 24 उपचुनावों में से कम से कम आधे से अधिक सीटों पर भाजपा की विजय पताका लहराना, तो ज्योतिरादित्य सिंधिया के सामने इससे भी बड़ी हिमालयीन चुनौती यह है कि उन सभी 22 दलबदलुओं की चुनावी वैतरणी पार कराना, क्योंकि उन्होंने अगाध श्रद्धा और एक सीमा तक स्वयं के हितों को साधने के लिए दलबदल किया एवं पिछले चुनाव में जो जनादेश कांग्रेस को मिला था उसे उलट दिया। कमलनाथ के सामने भी सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वे 24 में से कम से कम 18 से 20 स्थानों पर कांग्रेस को जीत दिलायें ताकि कांग्रेस का वह भरोसा जो उनके त्यागपत्र देने के फौरन बाद व्यक्त किया गया था कि 15 अगस्त 2020 को कमलनाथ फिर से झंडा फहरायेंगे और कांगे्रस की सरकार बनायेंगे।
प्रदेश में 15 साल की भाजपा की सत्ता को उखाड़ फेंकने में अहम् भूमिका पर्दे के सामने कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया की थी तो पर्दे के पीछे एक अहम् किरदार दिग्विजय सिंह थे। तीनों के मिले जुले अथक प्रयासों का ही यह परिणाम था कि अपने स्वयं के आभामंडल और मतदाताओं तथा सामाजिक सरोकारों के चलते शिवराज ने जो सीधे रिष्ते बनाये थे वे रिश्ते भी भाजपा को चैथी बार जीत नहीं दिला पाये। हालांकि चुनाव में सबसे बड़े दल कांग्रेस और भाजपा के बीच 6 सीटों का ही अन्तर था और उस दिन से ही भाजपा नेताओं शिवराज सिंह चैहान, कैलाश विजयवर्गीय, डॉ. नरोत्तम मिश्रा और नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव को यह भरोसा था कि कमलनाथ सरकार जो निर्दलियों एवं सपा-बसपा की बैसाखियों पर चल रही है वह ज्यादा दिन नहीं चल पायेगी। वैसे यह बात भी साफ थी कि जब तक कमलनाथ, दिग्विजय सिंह और ज्योतिरादित्य सिंधिया एक साथ हैं तब तक कमलनाथ सरकार चलती रहेगी और जिस दिन इनमें से कोई एक चेहरा अलग हो जायेगा तो फिर शायद ही इस सरकार को कोई चमत्कार ही बचा पाये। हुआ भी वैसा ही जैसे ही ज्योतिरादित्य सिंधिया ने स्वयं कांग्रेस पार्टी छोड़ी और उनके साथ 22 विधायकों ने दलबदल कर लिया तो सरकार धराशायी हो गयी।
ज्योतिरादित्य को सही मायनों में इन उपचुनावों में एक प्रकार की अग्नि परीक्षा से होकर गुजरना पड़ेगा और उनके साथ गए विधायकों में से यदि आधा दर्जन से अधिक विधायक दुबारा नहीं जीत पाये तो फिर उनका भी राजनीतिक कद और महत्ता उस अंचल में भाजपा की नजर में कम हो जायेगी जिसे वे अपना इलाका मानते हैं। जहां तक उनका स्वयं का सवाल है वे स्वयं अपने ही गृह निर्वाचन क्षेत्र में भाजपा उम्मीदवार से 2019 के लोकसभा चुनाव में बुरी तरह पराजित हो गए थे इसलिए इन उपचुनावों में उनके सामने एक और मौका है कि वे अपनी पकड़ अभी भी मजबूत है यह साबित करें। लेकिन यह इलाका एक-दो अपवादों को छोड़कर भाजपा का मजबूत गढ़ रहा है और भाजपा के बड़े नेता नरेन्द्र सिंह तोमर, प्रदेश भाजपा अध्यक्ष वी.डी. शर्मा, डॉ. नरोत्तम मिश्रा, प्रभात झा, अनूप मिश्रा, जयभान सिंह पवैया भी इसी क्षेत्र के हैं। इन सब लोगों ने लगातार संघर्ष कर भाजपा की जड़ें काफी गहरे तक जमा दी हैं। इन सबके चलते भी यहां की अधिकांश सीटें उपचुनाव में जीतने के बाद भी ज्योतिरादित्य उतना बड़ा श्रेय नहीं ले पायेंगे जितना वे कांग्रेस की जीत के लिए लेते रहे हैं। कमलनाथ ने कहा है कि परदे के पीछे दलबदल कराने के बाद क्या समझौते हुए, क्या वायदे हुए, यह धीरे-धीरे अपने आप साफ हो जायेगा। दलबदलुओं को आसानी से चुनाव जिताना स्वयं सिंधिया के लिए आसान नहीं होगा, क्योंकि अब कांग्रेस जोरशोर से इस बात का प्रचार करेगी कि इन्होंने जनादेश के साथ छल किया है तो दूसरे सिंधिया ने भी किसी बड़े पद की आकांक्षा में कांग्रेस छोड़ी है। सिंधिया राजपरिवार की पुरानी पृष्ठभूमि को भी अब कांग्रेसजन जोरशोर से उठाने की कोशिश करेंगे। इन सबके बीच मतदाताओं के गले कौन सी बात उतरती है यह उपचुनाव के नतीजों से ही पता चलेगा।
जहां तक शिवराज का सवाल है अब सरकार चलाने में उन्हें पहले से अधिक मशक्कत करते हुए संभल-संभल कर सबको साधने और बेहतर संतुलन की कला में सिद्धहस्त होने का परिचय देना होगा। अब उनकी सरकार में केवल भाजपा के समर्पित नेता और उनमें से अधिकांश संघ के संस्कारों से निकले नेता नहीं होंगे बल्कि कांग्रेसी संस्कृति में रचे-बसे ऐसे लोगों की जमात भी होगी जो केवल अपने नेता के अंधभक्त होंगे। ऐसे लोगों को अनुशासन और मर्यादा की लक्ष्मण रेखा में बांधकर रखना भी आसान नहीं होगा। इसके साथ ही पार्टी के उन नेताओं व कार्यकर्ताओं को संभाल कर साथ रखना होगा जो अभी तक उन विधायकों व नेताओं से टकराते रहे हैं जोकि अब उनके साथी बन गए हैं। इनमें सामंजस्य बैठाना भी शिवराज के लिए किसी बड़़ी चुनौती से कम नहीं होगा। यह सही है कि मौजूदा हालातों में जितना किसी सरकार के लिए संभव है उससे अधिक शिवराज सरकार कर रही है लेकिन कांग्रेस भी पूरी ताकत से उसे आरोपों के मकड़जाल में उलझाने की कोशिश कर रही है।
कांग्रेस में दिग्विजय सिंह भी हैं बड़ा चेहरा
जहां तक कमलनाथ का सवाल है फिर से कांग्रेस सरकार बनाना उनके लिए किसी बड़े पहाड़ को लांघने जैसा है, इसके लिए उन्हें काफी मशक्कत करना होगी। अब चुनावी मैदान में उनके अलावा दिग्विजय सिंह ही एक बड़े चेहरा होंगे जिनका पूरे प्रदेश में अपना एक मजबूत नेटवर्क है और उनकी इन उपचुनावों में अहम् भूमिका होगी। ग्वालियर-चंबल अंचल में डॉ. गोविंद सिंह, बसपा सहित अनेक दलों से होकर कांग्रेस में आये और दलित वोटों पर मजबूत पकड़ रखने वाले फूलसिंह बरैया तथा विधायक के.पी. सिंह और अपेक्स बैंक के पूर्व प्रशासक अशोक सिंह जैसे नेताओं के सहारे कांग्रेस अपनी चुनावी संभावनाएं चमकीली बनाने की जुगत में है। कुछ क्षेत्रों में पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अरुण यादव और पूर्व नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह का प्रभाव भी कांग्रेस को मददगार साबित हो सकता है। कांग्रेस के जीतने के मंसूबे इस बात पर अधिक निर्भर करेंगे कि अभी तक जो कांग्रेसी नेता ग्वालियर चंबल संभाग में यह महसूस करते थे कि सिंधिया के कारण उन्हें पार्टी में अवसर नहीं मिला जबकि वे असली मैदानी नेता हैं। अब ऐसे नेता अपनी उपयोगिता कितनी साबित कर पाते हैं इसका अवसर मिलेगा। इसके अलावा एक और विपरीत परिस्थिति का सामना कांग्रेस को उन लोगों को सक्रिय करने में करना होगा जो अभी भी शरीर से कांग्रेस में और दिल से ज्योतिरादित्य सिंधिया से अपने तार जुड़े रखना चाहते हैं। इस प्रकार पंजाधारी भाजपाइयों और कमलधारी कांग्रेसियों की गतिविधियों पर जो दल नजर रखते हुए नियंत्रण कर लेगा उसकी राह अधिक आसान हो जायेगी।