भक्ति मार्ग का जो यह अति सहज सरल साधन हैं, सप्रेम रामनामाकंन, इसमें त्याग और वैराग्य स्वतः आ धमकते हैं, चाहते हुए भी और नही चाहते हुए भी, स्वतः आना होता हैं उनको। 

नाम राम कथा 223
रामनामाकंनम विजयते"
श्रीरामस्वरूपायः श्रीरामनामविग्रहायै नमः।।
राम नाम कि बात तो अलग हैं ही परंतु, रामनामाकंन की बात् तो तीनो लोको में ही अलग हैं, विलक्षण नहीं अति विलक्षण हैं । यह वो साधन हैं जिसके लिए कहा गया हैं कि,--- एके साधे सब सधे' ।।‌
यह रामनाममहाराज की शरणागत हों कर सप्रेम रामनामाकंन करने वालों का सहज अनुभव हैं, उनको बताने की या समझाने की कतही आवश्यकता नहीं हैं, लेश मात्र भी आवश्यकता नहीं है।
यह सप्रेम रामनामाकंन तो अन्धे को भोजन का निमंत्रण देने जैसा हैं, जिसमें एक को बुलाने पर दुसरा स्वतः साथ आजाता हैं। 
रामनामाकंन सप्रेम-भक्ति का मार्ग हैं, भक्ति में यो विश्वास ही नहीं बल्कि अंधविश्वास होता हैं, अंधविश्वासमयी भक्ति के साथ ज्ञान और वैराग्य तो स्वतः चले आते हैं। 
पर ज्ञान मार्ग की बात भिन्न है।
ज्ञान चक्षुधारी हैं, वहाँ उसको किसिके साथ की आवश्यकता नहीं, उसको अपना विवेक स्वयं जाग्रत करना होता हैं और फिर विवेक जाग्रत होने पर वो सत्त और असत्त तत्त्व का स्वयं संधारण करके निर्धारण करता हैं कि, सत्य शाश्वत क्या हैं और नाशवान क्या हैं,। नाशवान का त्याग और शाश्वत का साथ ,यह ज्ञानी को कदम कदम पर स्वविवेक से ही निर्धारित करना होता हैं, उसीसे नाशवान का त्याग करना बनता हैं। 
पर भक्ति मार्ग का जो यह अति सहज सरल साधन हैं, सप्रेम रामनामाकंन, इसमें त्याग और वैराग्य स्वतः आ धमकते हैं, चाहते हुए भी और नही चाहते हुए भी, स्वतः आना होता हैं उनको।
रामनामप्रकाश की हल्की सी झलक के प्रकट होने से भी तमश को वहां से स्वतः भागना पडता ही है।, 
रोकने से भी नहीं रुकने वाला हैं। उसको जानाही होता हैं, यहाँ उनका जाना स्वतः त्याग हैं, और उस प्रकाश में और ज्ञानमार्ग से उत्पन्न प्रकाश में क्या ग्रहण योग्य और क्या त्यागकारक हैं स्वतः सपष्ट दिखाई देता हैं।
अच्छा प्रकाश हल्का हों या प्रगाढ़ पर कमरे में भरा हुआ काम या बेकाम का सामान तो स्वतः दिखाई देना आरम्भ हो ही जाता हैं न ? 
तो रामनामाकंन, और सप्रेम ससंकल्प रामनामाकंन, के पुर्श्चरण पूर्ण करते जाने पर ,प्रगट होने वाले विशुद्ध सहज प्रेमावस्था के धरातल पर वैराग्य स्वतः फलित होता है।
ज्ञानमार्ग और कर्ममार्ग में साधक को फिर भी सुक्ष्म अहं रहता हैं, अर्थात ज्ञानी को अपने त्याग और वैराग का सुक्ष्म अहं रहता हैं, यह मुक्त होने पर भी रहता हैं।जिससे दार्शनिकों में परस्पर अलगाव दिखाई देता हैं, भिन्नता और भेद भी दिखाई देता है। उसका कारण हैं, क्योंकि, सुक्ष्म अहंम वास्तव में अहंकार का संस्कार हैं। जो जन्म मरण का कारण तो नहीं होंता, परंतु गुणों का संग होजाने से जन्म मरण का कारण बन जाने मे भी बाधा रहित होता हैं। क्योंकि कारणं गुणसङ्गोsस्य सदसद्योनिजन्मसु"". मार्ग का संग जन्म-मरण का कारण नहीं होता। पर मार्गका संग तो हैं ना? जिस मार्गसे साधक को सिद्धि (मुक्ति) मिलती हैं उस मार्ग का संस्कार ,जो 'सूक्ष्म अहम ' कहलाता हैं । वो तो रहता हैं न !
हां सूक्ष्म अहम में स्वयं संसारके सन्मुख न होकर परमात्मातत्व के सम्मुख रहता हैं, परंतु एक बात अवश्य यहाँ समझने की हैं कि, यह ज्ञान की एकता में ही रहता हैं, रामनाममहाराज की शरणागतिसे प्रगट प्रेम मार्ग में कदापि नहीं । क्योंकि यहाँ भक्ति मार्ग की प्रधानता है और भक्ति मार्ग में भक्तकी स्वयं की निष्ठा नहीं होती, स्वनाम कीनिष्ठा नहीं ,स्वानुभुतियों की कोई निष्ठा नहीं, बल्कि उसकी निष्ठा तो भगवान में होती हैं ,भगवान के पावन नाम में होती, हैं, अतः इसको यों भी कह सकते हैं कि, सप्रेम समर्पित भाव से रामनामाकंन कर्ता साधक की निष्ठा भगवन्निष्ठ होती हैंं। अतः भक्ति में रामनामाकंन को समर्पित होजाने से अंहता बदलकर भगवान में लीन होजाती हैं। जिससे अहम का संस्कार नहीं रहता, । उसको उसके नामका,मान का सम्मानका अहं नहीं रहता हैं,परंतु रामनामाकंन भी यदि कोई ज्ञानमार्गी कर रहा होगा तो ज्ञानमें अहंता मिटाने का सुक्ष्म अहंम रह जाता हैं। 
हां पर उसकी भी भूमिका अत्यधिक चढ़ जाने पर उसका भी सुक्ष्म अहम आगे जाकर मिट जाता हैं। क्योंकि रामनामाकंन तो रामनामाकंन ही हैं, राम ही केवल प्रेम पिआरा"""" तो अन्ततोगत्वा प्रेम प्रकट हो ही जाता हैं। और यह जानलो कि, भेद तभी तक हैं जब तक ज्ञान का भान हैं, प्रेम में तो सब अभेद है। । प्रेम में भेद रह ही नहीं सकता, प्रेम में तो एकाकार होजाता हैं, भक्त और भगवान, नरनारायण की एकत्वता हैं, जानत तुम्हीं तुम्हहीं होई जाई।। राम को जानकर तो जानने वाला रामही हो जाता हैं, क्योंकि प्रेम में तो समग्र परमात्माराम की प्राप्ति होती हैं। प्रेममें रामजी की अनुभूति कोई टुकडों में नहीं होती। क्योंकि समग्रता की प्राप्ति में प्रेम कारण हैं। ज्ञान कारण नहीं हैं, और ज्ञान कारण हो ही नहीं सकता। 
विश्लेषण किया जाये तो बडी़ मजेदार बात सामने आयेगी कि, और वो बात भी बडी विचित्र बात हैं कि, ज्ञान मार्गमें भी मुक्ति प्रेम से ही होगी। 
इसका कारण गोस्वामी जी ने बताया मुझे तो वही बार बार समझ आता हैं कि, 
" राम ही केवल प्रेम पिआरा"
तो रामजी तो केवल प्रेम से ही अनुभूति में आते हैं तो ज्ञानियों को भी अंततः प्रेम से ही मुक्ति होती हैं। 
इसका बडा कारण जो कि जहां तक शब्दों में वर्णन किया जासकता हैं उसको ऎसे कहलो कि, 
अपने स्वरूप (सत्ता) में प्रेम ,आकर्षण हुए बिना स्वस्वरूपमें स्थिति नहीं होती,। 
अब ज्ञानी का अपने स्वरूप में जो प्रेम होता हैं, वह प्रेम उसको मुक्त तो कर देगा,पर समग्रताकी प्राप्ति भी करादे ,यह नियम नहीं हैं, कारण कि, उसमें मैं तू का जो भेद आरम्भ में रहता हैं, मैं ज्ञानमार्ग से ब्रह्म को अनुभूत करूंगा, के भाव को लेकर वो साधना आरम्भ करता हैं, या रामनामाकंन आरम्भ करता हैं तो इसमें स्वयं के कर्ता बनने का भाव अंततक सूक्ष्म अहंमवत बना रहता हैं, जबकि सप्रेम समर्पणभाव से रामनामाकंन कर्ता साधक का भाव तो ' तू जाणे रघुनाथ" वाला रहता हैं अतः उसके अहम को विलीन होना अति सहज होता हैं। क्योंकि उसको मान अपमान, का भान साधना आरम्भ करने के साथ ही तरलता को ग्रहण करने लग जाता है।, तरल को विरल और विरल को विलुप्त होना सहज हैं, पर ठोस को तरल होना ही बडा़ भारी काम हैं। 
अतः अक्षर ज्ञानियों में स्वमार्ग की चर्चाओं में तकरार होते देखी जासकती हैं। भक्त सबके साथ एक होजाता हैं पर ज्ञानी दुसरों के साथ एक नहीं हो पाता है।
कारण वही कि एक में आरम्भ से ही अभिमान रहता हैं और भक्त में आरम्भ से ही नम्रता ,दीनता,रहती है।
क्रमश्ः
जय जय सियाराम जय जय सियाराम।
हमतो रामनामाकंन की शरण हैं ठाकुर आगे तू जाणै और तैरा काम जाणै।


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