सीमा पर कुछ इलाकों को लेकर विवाद अगर द्विपक्षीय है तो नेपाल के प्रधानमंत्री केपी ओली ने चीन से संपर्क क्यों किया?



नेपाल नाराज़ है. आठ मई को भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने धारचुला से चीन की सीमा लिपुलेख तक एक सड़क का उद्घाटन किया था. नेपाल का दावा है कि सड़क उसके क्षेत्र से होकर गई है. नेपाल इस बात से इतना ख़फ़ा है कि उसने कालापानी के क़रीब छारुंग में सशस्त्र बलों की तैनाती कर दी. नेपाल ने जिस वक़्त सुरक्षा बलों की तैनाती की, वो भारत के लिए असहज करने वाला रहा. नेपाल के रक्षा मंत्री ईश्वर पोखरेल ने राइजिंग नेपाल को दिए इंटरव्यू यहाँ तक कहा दिया कि अगर ज़रूरत पड़ी तो नेपाल की सेना लड़ने के लिए तैयार है. कालापानी ने इंडो-तिब्बत बॉर्डर पलिस की भी तैनाती है. ज़ाहिर है कि आईटीबीपी की तैनाती नेपाल को लेकर नहीं है.


नेपाल के साथ सीमा विवाद भारत और नेपाल के बीच सीमांकन का इतिहास बहुत लंबा है. 1816 में सुगौली संधि के पहले नेपाल किंगडम का विस्तार पश्चिम में सतलज से लेकर पूरब में तीस्ता नदी तक था. एंउलो-नेपाली युद्ध में नेपाल की हार हुई और इसका अंत सुगौली संधि के साथ हुआ. सुगौली संधि के तहत नेपाल को काली और राप्ती नदी के बीच का पूरा मैदानी इलाक़ा ब्रिटिश इंडिया को सौंपना पड़ा. नेपाल में भारत के राजदूत रहे जयंत प्रसाद ने द हिंदू में 23 मई को लिखा है कि सुगौली संधि के तहत नेपाल फिर से इन इलाकों पर दावा नहीं कर सकता था. जयंत प्रसाद ने लिखा है, "ब्रिटिश इंडिया में लिपुलेख पास का इस्तेमाल तिब्बत और चीन के साथ व्यापार के लिए होता था. 1870 के दशक से सर्वे ऑफ इंडिया के नक्शे में लिपुलेख डाउन से कालापानी तक का इलाक़ा ब्रिटिश इंडिया का हिस्सा है. भारत की आज़ादी के बाद से नेपाल के राणा शासक और नेपाली राजाओं ने इनको लेकर कोई दावा नहीं किया. 1857 के विद्रोह में सैन्य मदद के लिए जंगबहादुर राणा को ब्रिटिश इंडिया ने इनाम के तौर पर नेपालगंज और कपिलवस्तु दे दिया था. लेकिन ब्रिटिश इंडिया ने गढ़वाल और कुमाऊं का कोई भी इलाक़ा वापस नहीं किया था. ब्रिटिश इंडिया ने केवल नेपाल के साथ ही सीमांकन नहीं किया था बल्कि चीन और पाकिस्तान के साथ भी ब्रिटिश इंडिया ने ही किया था." हालाँकि चीन के विदेश मंत्रालय ने कहा है कि लिपुलेख पर नेपाल और भारत के बीच का विवाद द्विपक्षीय है और उम्मीद है कि दोनों देश आपस में मिलकर सुलझा लेंगे. अगर चीन का विदेश मंत्रालय इसे द्विपक्षीय मुद्दा बता रहा है तो नेपाल फिर चीन से संपर्क क्यों कह रहा है? बाबूराम भट्टराई कहते हैं कि चीन का यह कूटनीतिक बयान है.



नाराज़गी वरिष्ठ पत्रकार और नेपाल मामलों के जानकार आनंदस्वरूप वर्मा कहते हैं कि लिपुलेख वाले मामले में चीन का शामिल होना स्वाभाविक है क्योंकि 2015 में प्रधानमंत्री मोदी जब चीन गए थे तो उसकी वक़्त धारचुला से लिपुलेख (चीनी सरहद) तक सड़क बनाने का समझौता किया था. आनंदस्वरूप वर्मा कहते हैं, "नेपाल ने उस वक़्त भी विरोध किया था और कहा था कि लिपुलेख का इलाक़ा उसका है और आप ऐसे समझौता नहीं कर सकते हैं. इस मामले में नेपाल चीन को लेकर नहीं आया है. यह सबको पता है कि लिपुलेख ट्राइजंक्शन है. यहाँ तीनों देशों की सीमाएं मिलती हैं."


'ओली पर उठ रहे हैं सवाल' वो कहते हैं, "नेपाल के साथ दिक्क़त यह है कि वर्तमान प्रधानमंत्री ओली के खिलाफ़ पार्टी के भीतर ही गंभीर सवाल उठ रहे हैं. उन्होंने कुछ भी ठोस किया नहीं है. ऐसे में वो ज़रूरी मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए ऐसे मुद्दे उठा रहे हैं. उन्हें तय करना है कि वो चीन की कठपुतली बनना चाहते हैं या फिर संप्रभु राष्ट्र. उन्हें चीन के निवेश और संबंधों के ख़तरों का अंदाज़ा होना चाहिए." क्या नेपाल का राष्ट्रवाद भारत विरोध पर केंद्रित होता जा रहा है? इस सवाल के जवाब में बाबूराम भट्टराई कहते हैं, "किसी देश की जनता में ऐसी भावना नहीं होती है. लेकिन शासक अपने हितों के लिए ऐसी भावनाओं को ज़रूरी मुद्दों से ध्यान हटाने के लिए उकसाता है. कई शासक अंतरराष्ट्रीय मुद्दों को साज़िश की तरह पेश करते हैं और जनता का ध्यान भटकाते हैं. भारत नेपाल के बीच जो सीमा विवाद है, उसमें तो किसी को शक नहीं है कि वो विवाद नहीं है. शासकों को इसे द्विपक्षीय मुद्दों की तरह ही सुलझाना चाहिए. दोनों देश इस बात को मानते भी हैं. मुझे लगता है कि पीएम ओली और पीएम मोदी को इस मुद्दे पर उच्चस्तरीय बात करनी चाहिए और विवाद को सुलझा लेना चाहिए."


'वफ़ादारी अपनी जनता के प्रति' भारत में नेपाली प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली की छवि भारत विरोधी बन रही है. आप इस पर क्या सोचते हैं? बाबूराम भट्टराई ने कहा, "मैं इससे सहमत नहीं हूँ. हर प्रधानमंत्री की वफ़ादारी वहां की जनता प्रति होती है. पीएम मोदी अपनी जनता के प्रति वफ़ादार होंगे, पीएम इमरान खान अपनी जनता के प्रति. वैसे ही नेपाल का कोई भी प्रधानमंत्री होगा तो वो अपनी जनभावना की उपेक्षा कैसे कर देगा?" वो कहते हैं, "यह केवल मोदी सरकार की बात नहीं है. पूर्ववर्ती सरकारों ने भी ऐसा ही किया है. राजीव गांधी ने भी आर्थिक नाकाबंदी कर बड़ी गलती की थी. वही ग़लती 2015 में मोदी सरकार से हुई. नेपाल के वर्तमान प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली तो भारत समर्थक माने जाते थे. लेकिन 2015 में मोदी सरकार की अघोषित नाकाबंदी के कारण ओली को भी चीन के पास मदद के लिए जाना पड़ा. चीन की तरफ़ जाने के लिए मजबूर तो हमारी सरकार कर रही हैं. नेपाल एक लैंडलॉक्ड देश है. तीन तरफ़ से भारत से घिरा है एक तरफ़ चीन है. कहा जाता है कि दो चट्टानों के बीच एक भूभाग दबा हुआ है. ऐसी भौगोलिक स्थिति में हमें नेपाल के साथ संवेदनशीलता और विवेक से पेश आने की ज़रूरत है." नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने एक बार फिर से पूरे विवाद पर सर्वदलीय बैठक बुलाई है. स्पष्ट है कि नेपाल इस विवाद पर अभी और आगे बढ़ने के मूड में है.


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