आँख खोलकर दूसरों की बुराई देखने की बजाय आँख बंद करके स्वयं की बुराई को देखना ज्यादा बेहतर है।

(राकेश शौण्डिक - राँची / झारखंड )


जय श्री कृष्ण आँख खोलकर दूसरों की बुराई देखने की बजाय आँख बंद करके स्वयं की बुराई को देखना ज्यादा बेहतर है। दूर दृष्टा बनो मगर दोष दृष्टा कभी मत बनो। जो दोष हम दूसरों में ढूंढते हैं अगर वही दोष स्वयं में ढूँढे जाएं तो जीवन के परिमार्जन का इससे श्रेष्ठतम कोई साधन नहीं हो सकता। शास्त्रों में एक बात पर विशेष जोर दिया कि मनुष्य को अंतर द्रष्टा होना चाहिए। जिसकी दृष्टि भीतर की तरफ मुड़ जाती है उसे स्वयं के भीतर ही उस अखंड ब्रह्म की सत्ता का आभास होने लगता है। अंतर द्रष्टा होने का अर्थ मात्र इतना है कि दोष बाहर नहीं अपितु स्वयं के भीतर देखे जाएं। जब हमारे स्वयं के द्वारा स्वयं का मुल्यांकन होने लगता है। स्वयं द्वारा स्वयं को अच्छे और बुरे की कसौटी पर परखा जाता है और स्वयं द्वारा स्वयं का छिद्रान्वेषण किया जाता है तो उस स्थिति में हमारा मन स्वतः शोधित होकर निर्मल और पावन होने लगता है। फिर वहीं से "निर्मल मन जन सो मोहि पावा" का सूत्र भी सत्य सिद्ध होने लगता है। निसंदेह जहाँ हृदय की पवित्रता, बुद्धि की शुद्धता, विचारों की निर्मलता और चरित्र की उच्चता है वहीं "शिवोऽहम्" के साथ - साथ "सर्वं खल्विदं ब्रह्म" का भाव स्वयं प्रकट हो जाता है। अतः स्वयं के दोष और दूसरों के गुण देखना ही आत्मोन्नति का एक प्रमुख सूत्र और सर्व श्रेष्ठ साधन भी है। राकेश कुमार शौणडिक राँची झारखंड


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