कहां चले??? मंदिर??? घंटा बजाने???* *जरा ठहरो! ( राकेश शौण्डिक - राँची/झारखंड)


*कहां चले??? मंदिर??? घंटा बजाने???* *जरा ठहरो!* क्या तुम्हें पता है कि नए नियम के अनुसार घंटा बजाने,प्रसाद चढ़ाने और लेने की मनाही है,मास्क लगाना , फिजिकल डिस्टैसिंग का पालन करना जरूरी है यानी उस सरकार को भी मंदिरों के भगवानों और देवी-देवताओं पर भरोसा नहीं है जो ईवीएम में धांधली करके चुनकर आई है जिसे जनता के स्वाथ्य की नहीं पंडे पुजारियों के पेट की चिंता है देश में कोरोना मरीजों की संख्या ढाई लाख पार कर चुकी है सात हजार लोग जान गंवा चुके हैं ऐसी हालत में धार्मिक स्थलों को जिनके बंद रहने से जनजीवन पर कोई असर नहीं पड़ रहा था खुलवाने का क्या औचित्य है ? तुम्हारे समझ में क्यों नहीं आता कि सरकार ने घंटा बजाने प्रसाद लेने देने पर तो प्रतिबंध लगाया लेकिन दानपेटी में पैसा डालने पर प्रतिबंध क्यों नहीं लगाया? क्यों नहीं समझ में आता मंदिर और सत्ता का गठबंधन? और उनके द्वारा तुम्हारे खिलाफ रात-दिन किए जा रहे षड्यंत्र? और तुम्हारे समझ में कब आएगा कि मंदिर जाकर तुम जिस मनुवादी व्यवस्था को मजबूत कर रहे हो उस व्यवस्था में तुम शूद्र हो ! उनके हर ग्रंथ में जिन्हें वे धार्मिक कहते हैं उनमें तुम्हारे लिए हीनता, अपमान, तिरस्कार के सिवा कुछ नहीं है और उन्हीं ग्रंथों की काल्पनिक कहानियों के काल्पनिक पात्रों को भगवान देवी देवता बनाकर मंदिरों में उनकी मूर्तियां रखकर , मूर्तियों में झूठ मूठ की प्राण प्रतिष्ठा का नाटक करके उनके सामने नाक रगड़ने से वहां रखी दान पेटियों में मेहनत की कमाई भरने से तुम्हारे कल्याण होने का झूठ दावा किया जा रहा है। लाॅकडाउन में दो ढाई महीने मंदिर नहीं गए तो तुम्हारी जिंदगी पर कुछ असर पड़ा? नहीं ना? लेकिन तुम्हारे न जाने से भगवान के धंधेबाज पंडे पुजारियों पर भूखों मरने की नौबत आ गई वे भगवान से नहीं सरकार से मदद मांगने लगे क्योंकि उन्हें पता है कि पत्थर की मूर्तियां उनका पेट नहीं भर सकतीं। लेकिन यही बात तुम्हें नहीं पता । कोरोना संकट में छोटे-छोटे बच्चों , बुजुर्गों , महिलाओं को भूखे-प्यासे सैकड़ों हजारों किलोमीटर पैदल चलने को मजबूर होना पड़ा , जिसके कारण सैकड़ों लोगों को जान गंवानी पड़ी। कोई भगवान देवी देवता उनकी मदद के लिए आया? नहीं ना? गांव गांव में कहीं दलितों की पिटाई, हत्या कहीं यादवों की हत्या कहीं पटेलों कहीं मौर्य कहीं कन्नौजिया की सवर्णों द्वारा हत्या हो रही है बहन बेटियां बलात्कार का शिकार हो रही हैं। उन्हें बचाने कोई भगवान आया? नहीं न? मनुवादी सरकारें नि:संकोच आरक्षण खत्म करते हुए तुम्हारे हिस्से की नौकरियां सवर्णों को दे रही हैं तुम्हारा हिस्सा तुम्हें दिलाने कोई भगवान आया? नहीं न? फिर भी मुंह लटकाए चल दिए मंदिर की ओर? तुम्हारे समझ में क्यों नहीं आता कि आज तक तुम्हें जो कुछ मिला है तुम्हारी खुद की मेहनत, समतावादी महापुरुषों के संघर्ष और संविधान के कारण मिला है उसमें इन मंदिरों और उनमें रखी भगवानों व देवी-देवताओं की पत्थर की मूर्तियों का कोई योगदान नहीं है,वे सिर्फ वहां बैठे पंडे पुजारियों का पेट भरने के साधन मात्र हैं यह बात संत कबीर,संत रविदास,प्रबोधनकार ठाकरे,संत गाडगे, ज्योतिबा फुले, रामास्वामी पेरियार, बाबा साहेब और भी सैकड़ों महापुरुषों ने समझाई लेकिन आज तक तुम्हारी समझ में नहीं आई। कोरोना संकट ने सभी भगवानों की पोल खोल कर रख दी अब तो समझो अब तो अपने मेहनत की कमाई निठल्ले पंडे पुजारियों का पेट भरने के बजाय अपने बच्चों के स्वाथ्य शिक्षा और उनके उज्वल भविष्य के निर्माण पर खर्च करो। जब खुद ही अंधविश्वासी बने रहोगे तो बच्चों में वैज्ञानिक सोच कैसे विकसित होगी? सरकार ने ढाई महीने का लाॅकडाउन लगाया सभी धार्मिक स्थलों पर ताले लटके रहे , न पत्थर की मूर्तियों को कोई फरक पड़ा न दर्शन करने वाले को ,फर्क पड़ा तो भोली-भाली जनता की गाढ़ी कमाई धर्म के नाम लूटकर अपनी तोंद बढ़ाने वाले निठल्ले पंडे पुजारियों को वे दो ढाई महीने में ही बिलबिलाने लगे । *ढाई महीने सरकार का था अब ढाई साल शूद्रों का लाॅकडाउन!!!* *अब प्रत्येक शूद्र यानी एससी एसटी ओबीसी को मंदिरों के लिए अपनी तरफ से ढाई साल का लाॅकडाउन* *पालने की जरूरत है।* *यदि यह समाज ठान ले कि ढाई साल हममें से कोई भी मंदिर नहीं जायेगा और अपने महापुरुषों फुले साहू अम्बेडकर पेरियार आदि की किताबों को पढ़ेगा उनके बताए मार्ग पर चलने का प्रयास करेगा तो सारी समस्याओं को समाधान न हो जाए तो कहना ।* *यकीन करो ढाई साल के इस लाॅकडाउन से भारत से ब्राह्मण शाही का खात्मा और बहुजन शाही स्थापित होने का मार्ग प्रशस्त हो जायेगा।*


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