देव तुल्य लोग जीवित हैं।* -रोचक कहानी

(वीरेंद्र झा)


 *एक फटी धोती और फटी कमीज पहने एक व्यक्ति अपनी 15-16 साल की बेटी के साथ एक बड़े होटल में पहुँचा ।* उन दोनो को कुर्सी पर बैठा देख एक वेटर ने उनके सामने दो गिलास साफ ठंडे पानी के रख दिए और पूछा - आपके लिए क्या लाना है ?



उस व्यक्ति ने कहा - "मैंने अपनी बेटी से वादा किया था कि यदि तुम दसवीं कक्षा में जिले में प्रथम आओगी तो मैं तुम्हें शहर के सबसे बड़े होटल में एक डोसा खिलाऊंगा । *आज मेरी बेटी ने अपना वादा पूरा कर दिया है, अब बारी मेरी है इसलिए कृपया इसके लिए एक डोसा ले आओ ।"वेटर ने पूछा - "आपके लिए क्या लाना है ?" उसने कहा -"मेरे पास ज्यादा पैसे नहीं हैं, मेरे पास केवल एक डोसे का ही पैसा है , इसलिए आप मेरी बेटी को केवल एक डोसा खिला दें ।"* पूरी बात सुनकर वेटर काफी भावुक हो गया और मालिक के पास गया और पूरी कहानी बता कर कहा -"मैं इन दोनों को भर पेट खाना खिलाना चाहता हूँ ।अभी मेरे पास पैसे नहीं हैं, इसलिए इनके बिल की रकम आप मेरी सैलरी से काट लें । *"मालिक ने कहा - "हम ऐसा नहीं करेंगे, आज हम इस होनहार बेटी को अपने होटल की तरफ से एक शानदार पार्टी देंगे ।" होटल वालों ने एक टेबल को अच्छी तरह से सजाया और बहुत ही शानदार ढंग से सभी उपस्थित ग्राहकों के साथ उस गरीब बच्ची की सफलता का जश्न मनाया।* मालिक ने उन्हें एक बड़े थैले में तीन डोसे और पूरे मोहल्ले में बांटने के लिए मिठाई उपहार स्वरूप पैक करके दे दी । इतना सम्मान पाकर आँखों में खुशी के आंसू लिए वे अपने घर चले गए । *धीरे - धीरे समय बीतता गया और एक दिन वही लड़की आई. ए. एस. की परीक्षा पास कर उसी शहर में कलेक्टर बनकर आई । उसने सबसे पहले उसी होटल मे एक सिपाही भेज कर अपना संदेशा भिजवाया कि आज रात का भोजन कलेक्टर साहिबा इस होटल में करने आयेंगी ।* होटल मालिक ने तुरन्त एक टेबल को अच्छी तरह से सजा दिया । यह खबर सुनते ही पूरा होटल ग्राहकों से भर गया । तय वक्त के अनुसार कलेक्टर साहिबा अपने माता-पिता के साथ होटल पहुँची । जब कलेक्टर साहिबा ने मुस्कुराते हुए होटल में मुस्कराते हुए होटल में प्रवेश किया तो होटल के मालिक सहित होटल के सभी कर्मचारी कलेक्टर साहिबा के सम्मान में उठकर खड़े हो गए । *होटल के मालिक ने उन्हें गुलदस्ता भेंट किया और ऑर्डर के लिए निवेदन किया । कलेक्टर साहिबा ने खड़े होकर होटल के मालिक और उस वेटर के आगे नतमस्तक होकर कहा- "शायद आप दोनों ने मुझे पहचाना नहीं ।* मैं वही लड़की हूँ जिसके पिता के पास दूसरा डोसा लेने के पैसे नहीं थे और आप दोनों ने मानवता की सच्ची मिशाल पेश करते हुए, मेरे दसवीं पास होने की खुशी में एक शानदार पार्टी दी थी और मेरे पूरे मोहल्ले के लिए भी आपने मिठाई पैक करके दी थी । आज मैं आप दोनों की बदौलत ही कलेक्टर बनी हूँ। *आप दोनों का एहसान मैं सदैव हमेशा याद रखूंगी।आज की यह पार्टी आप सभी के लिए मेरी तरफ से है और इस पार्टी में शामिल सभी ग्राहकों एवं पूरे होटल के कर्मचारियों का बिल मैं दूंगी ।* कल आप दोनों को " श्रेष्ठ नागरिक " का सम्मान एक नागरिक मंच पर किया जायेगा । *इस कहानी को आपके साथ साझा करने का मुख्य उद्देश्य यह है कि आज से हम अपनी आमदनी का कम से कम 5% समाज के निर्धन होनहार बच्चों की शिक्षा और उनके बेहतर भविष्य के लिए खर्च करेंगे ताकि ये बच्चे Mission pay back to society को आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित हों ।* ✍✍


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