शिवराज-सिंधिया की टुकड़ी पर भारी पड़ेगी कमलनाथ की रणनीति - दिनेश साहू-प्रवक्ता म.प्र. कांग्रेस कमेटी

 हो न हो मध्यप्रदेश ने फरवरी से लेकर अब तक दो आपदाओं का सामना किया है। एक तो वैश्विक महामारी कोरोना और दूसरी ओर चंद सत्तालोभी नेताओ ने खड़ी की राजनीतिक महामारी..



कोरोना काल के दौरान उपचुनाव की समाप्ति तो हो गयी परन्तु अब खड़ी हुई मध्यप्रदेश के इम्तिहान की घड़ी। मध्यप्रदेश में सरकार का भविष्य तय करेगा पेटी में बंद 28 विधानसभाओं में पड़े वोट। नतीजा आने में अब से ठीक 48 घंटे शेष हैं उधर एग्जिट पोल की बाढ़ आना शुरू हो गयी है। कई प्रमुख चैनलो ने इसे शिवराज-सिंधिया के पक्ष में मत दिया है। मीडिया क्या और किस पैमाने में दिखता है यह हम सब अच्छे से वाकिफ हैं। यदि ज़मीनी स्तर पर आकलन किया जाए तो ये एक्ज़िट पोल तो कम परंतु निर्दलीय विधायकों की क़ीमत घटाने और अपनी पार्टी की भगदड़ रोकने का बीजेपी का प्लान “सी” है, जिसे इनकार नही किया जा सकता। देखा जाए तो बीजेपी ने एक्जिट पोल के माध्यम से एक बार फिर से लोगों को यह बताने की कोशिश की है कि उसे मध्य प्रदेश के उपचुनावों में ठीक ठाक संख्या में सीटें मिल रही है और शिवराज या कहें सिंधिया सरकार पूरी तरह से सुरक्षित है। राजनैतिक पंडितों ने जब एग्ज़िट पोल के आंकड़ों का अध्ययन किया तो उसमें ज़मीनी वास्तविकता कम और बीजेपी को लाभ देने के मंसूबे ज़्यादा नज़र आए। बीजेपी के नेता एक तरफ़ निर्दलीय, बसपा एवं सपा के विधायकों से समर्थन की गुहार लगा रहे हैं वहीं दूसरी तरफ़ बीजेपी के लिये अपने विधायकों को समेटे रखना भी टेढ़ी खीर साबित होता जा रहा था, ऐसे में बीजेपी ने अपने विधायकों को रोकने एवं निर्दलीय व अन्य की क़ीमतों को घटाने के लिये यह प्रचारित कराना प्रारंभ कर दिया है कि मध्यप्रदेश में उनकी सरकार सुरक्षित है। मतदान पश्चात निर्दलीय, सपा एवं बसपा विधायको की ताबड़तोड़ भागदौड़ इस बात का प्रमाण है कि वे यह जान गए है कि भाजपा यदि सत्ता में आती है तो उनकी तवज्जो पार्टी में वह नही रहेगी जो शिवराज में सिंधिया-राज के पहले थी। वे जान गए हैं कि भाजपा फिलहाल सिंधिया समर्थकों को सत्ता भोगी बनाएगी जिन्होंने कमलनाथ सरकार का पतन किया था। एग्ज़िट पोल में महाकौशल, मालवा एवं बुंदेलखंड में कांग्रेस को बेहद कमज़ोर दिखाया गया है जबकि वास्तविकता इसके ठीक विपरीत है। ग्वालियर एवं चंबल में भी कांटे की टक्कर बतायी गई है, जबकि वहाँ कांटे की टक्कर नहीं बल्कि कांग्रेस के पक्ष में लहर है। अंदरूनी तौर पे इस चुनाव ने वर्षो से जी जान से जमे हुए भाजपा कार्यकर्ताओं की सेंधमारी करने का काम किया है। देखना दिलचस्प होगा कि निर्दलीय, सपा एवं बसपा के विधायक बीजेपी की इस चाल का किस तरह से प्रतिरोध करते हैं एवं भारतीय जनता पार्टी अपने नाराज़ विधायकों को इस चाल से कितना सहेजने में क़ामयाब होती है। फ़िलहाल राजनैतिक विश्लेषकों की मानें तो मध्य प्रदेश में सत्ता परिवर्तन तय है। मध्यप्रदेश के चुनाव परिणाम केवल सत्ता परिवर्तन नहीं बल्कि ख़रीद फ़रोख़्त की राजनीति के ख़िलाफ़ जनमत संग्रह भी है।


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