विधवा मां के लिए आत्मनिर्भर योग्य वर खोजता बेटा एकाकी जीवन गुजारने की बजाय सबको बेहतर तरीके से जीने का अधिकार है."


"मुझे अपनी विधवा मां डोला अधिकारी के लिए एक योग्य वर चाहिए. मैं रोज़गार के सिलसिले में ज़्यादातर समय घर से बाहर रहता हूं. ऐसे में मेरी मां घर में अकेली पड़ जाती हैं. मुझे लगता है कि एकाकी जीवन गुजारने की बजाय सबको बेहतर तरीके से जीने का अधिकार है." इसी महीने आस्था नामक एक युवती ने भी अपनी मां के लिए 50 साल के एक सुंदर व्यक्ति की तलाश में एक ट्वीट किया था. वो ट्वीट काफी वायरल हुआ था.


ट्वीट काफी वायरल हुआ था. - 'पापा मां को धोखा दे रहे थे और मैं उन्हें बता न सका' . मां-बाप की दूसरी शादी बच्चों को कैसी लगती है आस्था ने कहा था कि वह अपनी मां के लिए जो आदमी तलाश रही हैं उसे जीवन में काफी स्थापित और शाकाहारी होना चाहिए. इसके अलावा वो शराब नहीं पीता हो. पांच साल पहले गौरव के पिता का निधन हो गया था. उसके बाद उनकी 45 वर्षीया मां घर में अकेले ही रहती हैं. लेकिन आखिर उन्होंने फ़ेसबुक पर ऐसी पोस्ट क्यों लिखी?


क्या लिखा था गौरव ने? गौरव ने आखिर अपने फेसबुक पोस्ट में क्या लिखा है? उन्होंने लिखा है, "मेरी मां डोला अधिकारी हैं. मेरे पिता का निधन पांच साल पहले हो गया था. नौकरी की वजह से मैं अधिकतर घर से बाहर रहता हूं. इससे मां अकेली पड़ जाती हैं. मेरी मां को किताबें पढ़ना और गाने सुनना पसंद हैं. लेकिन मैं अपनी मां के लिए एक साथी चाहता हूं. मुझे लगता है कि पुस्तकें और गीत कभी किसी साथी की जगह नहीं ले सकते. एकाकी जीवन गुजारने की बजाय बेहतर तरीके से जीना ज़रूरी है. मैं आने वाले दिनों में और व्यस्त हो जाऊंगा. शादी होगी, घर-परिवार होगा. लेकिन मेरी मां? हमलोगों को रुपये-पैसे, जमीन या संपत्ति का कोई लालच नहीं हैं. लेकिन भावी वर को आत्मनिर्भर होना होगा. उसे मेरी मां को ठीक से रखना होगा. मां की खुशी में ही मेरी खुशी है. इसके लिए हो सकता है कि कई लोग मेरी खिल्ली उड़ाएं या किसी को लग सकता है कि मेरा दिमाग ख़राब हो गया है. ऐसे लोग मुझ पर हंस सकते हैं. लेकिन उससे मेरा फैसला नहीं बदलेगा. मैं अपनी मां को एक नया जीवन देना चाहता हूं. चाहता हूं कि उनको एक नया साथी और मित्र मिले."


उनकी इस पोस्ट पर कैसी प्रतिक्रियाएं मिल रही हैं? गौरव बताते हैं, "इस पोस्ट के बाद कई लोगों ने फोन कर विवाह की इच्छा जताई है. इनमें डाक्टर और मैरीन इंजीनियर से लेकर शिक्षक तक शामिल हैं. उनमें से किसी योग्य पात्र को तलाश कर मां का दूसरा विवाह कराना ही फिलहाल मेरा प्रमुख लक्ष्य है." लेकिन क्या समाज के लोग इस पोस्ट के लिए आपका मजाक नहीं उड़ा रहे हैं? गौरव जिस बऊबाजार इलाके में रहते हैं उसी मोहल्ले के शुभमय दत्त कहते हैं, "ये एक अच्छी पहल है. कई लोग कम उम्र में ही पति या पत्नी के निधन से अकेले पड़ जाते हैं. रोजी-रोटी की व्यस्तता की वजह से संतान भी उनका वैसा ध्यान नहीं रख पाती. ऐसे में जीवन की दूसरी पारी की शुरुआत का विचार बुरा नहीं है." कहेंगे ही. लेकिन अपनी मां के भविष्य के बारे में एक पुत्र की यह चिंता समाज की बदलती मानसिकता का संकेत है." . वो औरतें परिवार के साथ क्यों नहीं खातीं? #100WOMEN खाना पकाने से बदल गया 'एक हिंसक व्यक्ति नई नहीं परंपरा पश्चिम बंगाल में विधवा विवाह की परंपरा नई नहीं हैं. विधावाओं के पुनिर्विवाह के लिए समाज सुधारक ईश्वर चंद्र विद्यासागर ने सबसे पहले आवाज उठाई थी. इस साल उनकी दो सौवीं जयंती मनाई जा रही है. उनके प्रयासों की वजह से ही 16 जुलाई, 1856 को देश में विधवा विवाह को कानूनी तौर पर मान्यता मिली थी. खुद विद्यासागर ने अपने पुत्र का विवाह भी एक विधवा से ही किया था. इस अधिनियम से पहले तक हिंदू समाज में ऊंची जाति की विधवा महिलाओं को दोबारा शादी की इजाजत नहीं थी. नाटिंघम विश्वविद्यालय के स्कूल आफ इकोनामिक्स के इंद्रनील दासगुप्ता के साथ विधवा पुनर्विवाह अधिनियम, 1856 की नाकामी पर शोध करने वाले कोलकाता स्थित भारतीय सांख्यिकी संस्थान के दिगंत मुखर्जी कहते हैं, "ईश्वर चंद्र विद्यासागर की अगुवाई में चले सामाजिक आंदोलन के दबाव में तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने उक्त अधिनियम को पारित जरूर कर दिया था. लेकिन आगे चल कर समाज में इसका खास असर देखने को नहीं मिला. विधवाओं को समाज में अछूत ही माना जाता रहा." वह कहते हैं कि एकल परिवारो के मौजूदा दौर में विधवाओं की हालत और बदतर हुई है. यही वजह है कि बनारस और वृंदावन के विधवाश्रमों में बंगाल की विधवाओं की तादाद साल-दर-साल बढ़ती जा रही है.