प्रसंग अर्णब: टीवी स्क्रीन के विमर्श में ‘कुकुरयाना-शोर’ का दाखिला

प्रसंग अर्णब: टीवी स्क्रीन के विमर्श में ‘कुकुरयाना-शोर’ का दाखिला


- उमेश त्रिवेदी
- लेखक सुबह सवेरे के प्रधान संपादक है।
साभार  सुबह  सवेरे


यह प्रसंग अर्णब-गोस्वामी है। याद नही कि देश के इस हाहाकारी एंकर की अगुवाई में ’टाइम्स नाउ’ देखना कब छोड़ दिया था, और  भारी भरकम ’नेशनलिस्ट-मार्केटिंग’ और राष्ट्रवादी आव्हानों के बावजूद  ’रिपब्लिक टीवी’ के स्क्रीन के दीदार आज तक नहीं किए। (बुधवार को पहली बार कुछ मिनटों के लिए यह गुस्ताखी की थी ... वह भी यह जानने के लिए कि इस ’शब्द-विप्लवी’  एंकर ने सोनिया गांधी के बारे में ऐसा क्या कह दिया कि कांग्रेस उनकी जान लेने पर उतारू हो गई? )
बहस हो सकती है कि पत्रकारिता की तटस्थ कसौटियों के मद्देनजर ’टाइम्स नाऊ’ और ’रिपब्लिक टीवी’ को सूचनाओं के दायरों से बाहर रखना मुनासिब है या नहीं? लेकिन यह कदम टीवी स्क्रीन को  डब्ल्यू-डब्ल्यू-एफ के एरिना में ढालने वाले सुपर एंकर-रैफरी अर्णब गोस्वामी के एकतरफा प्रायोजित सवालों पर होने वाले आततायी मुकाबलों से बचने का सादा-सा उपाय था। चालीस-पैंतालीस साल तक प्रिंट-मीडिया (नई दुनिया) में ठीक-ठाक पत्रकारिता करने का तमगा मेरे पास है। इतने लंबे-चौड़े काल खंड में हर व्यक्ति में बौध्दिकता और अनुभव के अपने तकाजे (आप पूर्वाग्रह भी कह सकते हैं) विकसित हो जाते हैं। वर्षों तक चौबीसों घंटों खबरों की दुनिया में खबरों की मानसिक जुगाली के अपने मायने होते हैं। संभव है कि यह अपने तरीके से खबरों को तौलने का नजरिया था, जिसने मुझे टाइम्स नाउ की तथाकथित लोकप्रियता और रिपब्लिक टीवी के महाअवतरण से भयभीत कर दिया था कि मैं ये चैनल देखने का साहस ही नही जुटा पाता था।  फिर, जब तय है कि खुदाई के बाद चुहिया भी हाथ आने वाली नहीं है, तो रोजाना पहाड़ खोदकर चुहिया निकालने की नकारा कोशिशों में किसी को क्यों भागीदार होना चाहिए? निष्कर्ष-विहीनता टीवी चैनलों की मौजूदा बहसों की नियति-सी बन गई है?
इंदौर-भोपाल जैसे मध्यम शहरों में पले-बढ़े मेरे जैसे साठ पार’ के लोग नगर पालिका के कर्मचारियों व्दारा शहर की सड़कों और गलियों में भटकने वाले आवारा जानवरों को पकड़ने की मुहिम से अनभिज्ञ नहीं होंगे। साठ के दशक में यह मुहिम नगर की मुख्य गतिविधियों का हिस्सा होती थी। नगर पालिकाओं की इस मुहिम में आवारा कुत्तों को पकड़ने के लिए एक कुत्ता गाड़ी भी साथ होती थी। बच्चे इन गाड़ियों के पीछे दौड़ा करते थे कि उनके मोहल्ले का कोई पालतू कुत्ता तो पकड़-धकड़ का शिकार नहीं हो गया है। बहलहाल गाड़ी में जो कुत्ते पहले से ही बंद होते थे, वो लगातार भौंकते रहते थे। और, कुछ कुत्ते सड़क पर निगम-कर्मियों की पकड़ से बचने के लिए सरपट भागते हुए भौंकते रहते थे। पिंजरे में भीतर और बाहर, कुत्तों का बेइंतिहा भौंकने का शोर कुछ समय के लिए मोहल्ले के रहवासियों और राहगीरों का जीना दूभर कर देता था। लोग शोर से बचने के लिए कानों पर हाथ रख लेते थे।
विडम्बना यह है कि देश के मौजूदा राजनीतिक परिद्दश्य में मत-विमत के बीच संवैधानिक सहमति, समन्वय और सदाचार की महीन और मासूम दलीलें और अपीलें उस शोर मे बदल गई हैं, जो नगर-निगम की कुत्ता-गाड़ी मे उठने वाले शोर की यादों को तरोताजा कर देती है। लोकतंत्र में टीवी-स्क्रीन पर तर्क-वितर्क की दुनिया में ’कुकुरयाना-शोर’ का यह दाखिला डरावना है। टीवी स्क्रीन पर मत-विमत और वैचारिक विमर्श की दुनिया में अर्णब गोस्वामी जैसे एंकरों की ताल पर हर दिन गूंजने वाला ’कुकुर-नाद’ लोकतंत्र की दलीलों को भयाक्रांत और निरर्थक बना रहा है।
यह आभास दो दिन पहले ही होने लगा था कि अर्णब गोस्वामी के जहन में कोई प्लॉट अंगड़ाई ले रहा है। वो अपनी और रिपब्लिक चैनल की लोकप्रियता की हारी हुई लड़ाई लड़ रहे हैं। पहले उन्होने पालघर में दो साधुओं के मॉबलिंचिग को सांप्रदायिकता का जामा पहनाने की कोशिश की। फिर इसी मॉब लिंचिंग के लाइव-प्रोग्राम में एडिटर्स गिल्ड से इस्तीफा देने की घोषणा की। अब अचानक सोनिया गांधी उनके निशाने पर आ गई हैं। भाजपा का अर्णब गोस्वामी के साथ खड़ा होना राजनीतिक-मायाजाल की ओर इशारा कर रहा है। उसकी ट्रोल-सेना सोनिया के नाम पर भिन्न किस्म के हैश टैग के साथ ट्विटर पर सक्रिय है। उनकी नाराजी यह है कि सोनिया गांधी ने साधुओं की हत्या पर कोई प्रतिक्रिया क्यों जाहिर नहीं की? अब आरोपों की सूची में ईसाइयत, इटली, मिशनरी कनेक्शन और बार-बाला जैसे चरित्र-हत्या से जुड़े मुद्दे ट्विटर पर शोर मचा रहे हैं।
गोस्वामी ने कांग्रेस के हमले को प्रेस की आजादी से जोड़ते हुए अभिव्यक्ति की रक्षा के लिए प्राण तक न्यौछावर करने का संकल्प व्यक्त किया है। दिलचस्प यह है कि मॉब लिंचिंग की विशेषज्ञता के इस दौर में  कांग्रेस-हायकमान ने उन पर हमला करने के लिए मात्र दो लोगों को भेजना ही मुनासिब समझा...। उनका बाल-बांका नहीं हुआ और हमलावर गिरफ्तार भी हो गए।


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