श्री रामस्वरूपायःश्रीरामनामविग्रहायैनमः

नाम राम कथा 218
श्री रामस्वरूपायःश्रीरामनामविग्रहायैनमः


यह जो "राम" हम लिखित जप करते हैं, यह अति असाधारण बात हैं।
हम एक बार राम लिखते हैं तो एक नाम मूर्ति स्थापित करदी हैं। यह लिखित राम नाम जप भगवान के नाम का विग्रह हैं।
और जौ मूर्ति होती है वो स्वरूप का विग्रह हैं। तो जो रामनाम विग्रह हैं, वो भी राम जी का निज स्वरूप ही हैं, एक बार राम लिखने का जो फल हैं वो भी उतना ही हैं जितना की एक विसाल मंदिर बना कर उसमें लाखों रुपये में भगवान के स्वरूप की मूर्ति बनवा कर विधि विधान से स्थापित करवाने पर जो पुण्य लाभ मिलता हैं, उतना का उतना तो मान ही लो। 
राम नाम विग्रह स्थापित करने का कोई विधि विधान नहीं हैं, न मुहूर्त न तिथि विशेष, न समय स्थान ,किसी भी प्रकार का विधि निषेध रामनाममहाराज की शरण जाने में लागू नहीं है।
जब भक्त की इच्छा हो जाये तभी सब मुहूर्त हो जाता हैं, जब रामजी की कृपा हो जाये तभी मुहूर्त । 
सुदिन सुलगन तबहीं जब राम होई जुवराज। 
रामनामाकंन जब करें तभी मुहूर्त, हैं। पर भगवान का या किसीभी देवी देवता का स्वरूप (विग्रह) स्थापित करते हैं तो उसमें समस्त विधिनिषेध का ध्यान रखते हुए वैदिक मंत्रोचारण के साथ प्राण प्रतिष्ठा करवाने पर ही मूर्ति में सजीवता आ पाती हैं और उसका प्रमाण भी सबके सामने आ जाता हैं।
परंतु रामनाम महाराज के विग्रह स्थापन में, अर्थात रामनामाकंन में कोई किसी भी प्रकार का विधिनिषेध नहीं हैं, यह अतिपावन महामंत्र हैं। पंचम महावाक्य हैं। पंचम भजन सो वेद प्रकासा।।। यह रामनाम महाराज की शरणागति हैं। 
रामजी का नाम ।।
इस जगत में ले और देने को कोई सर्व श्रेष्ठ वस्तु हैं तो वो हैं "रामजी का नाम".। गीत में गाया नरसीजी ने, जब उनसे पुछा कि मायरा भरने जा रहे हो तो, क्या क्या वस्तुएं है। तो उन्होंने कहा कि, मेरे पास क्या हैं ? 
लेने देने के नाम पर तो बस रामजी का नाम हैं। गाते हुए कहा कि,
लेबा न देबा न भाया रामजी को नाम रे।।
और उसी रामजी के नाम ने छप्पन करोड़ का मायरा उस जमाने में भर दिया जिसका मुल्य आज के जमाने में आंकलन किया जाना असंभव हैं।
तो रामनाम महाराज की शरण जसने के लिए भक्ति मार्ग को अपनाना हैं, ज्ञानी व्यक्ति भक्ति मार्ग का साधक नहीं हो पाता,कारण ज्ञान मार्ग में अहं रहता हैं। पर भक्ति मार्ग में अहं नहीं समर्पण रहता हैं, समर्पण कभी भी अहंम की प्रधानता रहते होना असंभव रहता हैं। 


जहां तक संतो शास्त्रों की बात करते हैं तो गीता में भगवान श्री कृष्ण ने तीन मार्ग बताये, कर्म,भक्ति, ज्ञान, योग। तीनो योगों की अपनी प्रधानता हैं। पर इन तीनो के अतिरिक्त और कोई परमात्मानुभति का साधन नहीं है। हां यह रामनामाकंनयोग को चौथा कह सकते हैं क्योंकि इसमें तीनो योगों का सहज समाहन होजाता हैं या यों कहलो कि, रामनामाकंन योग जो हैं वो सभी तरह के योगियों को अपना लक्ष्य प्राप्त कराता हैं। 
कर्मयोग और ज्ञानयोग में साधक को संसार से संबंध -विच्छेद करने की प्रधानता रहती हैं। और भक्ति योग में भगवान से संबंध जोड़ने की मुख्यता रहती हैं। और फिर साहब कलिकाल के मानवों में तो जोडने की प्रवृत्ति तो वैसे ही होती हैं तो सांसारिक वस्तुओं को जोडने मे लगा उसको रामनाम जोड़ने में लगा देना जरा आसान जाम ही हैं, पर संसार विच्छेद करने का मार्ग बडा़ कठिन, है। तभी तो कहा कि, ज्ञान मार्ग कृपाण के ही धारा। ज्ञान मार्ग को दो धारी तलवार की उपाधि दी हैं पर भक्ति को, ? 
"आलौकिक साधन" कहा हैं। 
क्योंकि जो कर्म और ज्ञान मार्ग हैं वो लौकिक मार्ग हैं। 
दोनों में जरा मोटे रूप से फर्क समझ लेते हैं। 
कर्मयोग एवं ज्ञान योग लौकिक साधन हैं, क्योंकि इनमें विवेक की आवश्यकता होती हैं, इसमें बिना विवेक संसार से संबंध विच्छेद की अनुभूति कर ही नहीं सकते, और विवेकमार्ग में विवेककी मुख्यता होती हैं, और जहां विवेक काम कर्ता हैमन वहाँ श्रद्धा-विश्वास की गौणता रहेगी ही। 
दुसरा जो भक्ति मार्ग हैं यह अलौकिक साधन हैं, हैं, इस मार्ग में विवेक गौण रहता हैं और विश्वासमार्ग की प्रधानता रहती हैं। 
तो संसार से सबंध विच्छेद करने में विवेक काम आता हैं, और भगवान से संबंध जोडने में विश्वास काम आता हैं, यथा:- बिनु विश्वास भक्ति नहीं ". ।
अब अधिकतर साधकों में देखने में आता हैं कि, वो विवेकमें विश्वास मिलाता हैं और विश्वासमें विवेक को मिलाता हैं, मतलब कि, विवेकमार्ग में विश्वासकी मुख्यता और विश्वासमार्ग में विवेककी प्रधानता करते रहते हैं, इस कारण उनके साधन जल्दी सफल नहीं होते, ।।
संसार से मैरा संबंध हैं कि नहीं ? यह जानने के लिए विश्वास की नहीं विवेक की आवश्यकता हैं। 
दुसरा भगवान हैं कि, नहीं ? और हैं तो मेरे हैं कि, नहीं ? इसमें विवेक नहीं करना होता हैं बल्कि विश्वास करना हैं। 
देखो यहाँ कारण बिलकुल साफ स्पष्ट हैं। 
कि, जगत् और जीव विचार के विषय हैं, और भगवान मात्र विश्वास (मान्यता) के विषय हैं। विवेक विचार वहाँ लगता हैं जहां सन्देह होता है। वगर सन्देह अल्प ज्ञान या अधुरे ज्ञान में होता हैं। अध भण्या घरकां न खावे' मतलब सीधासा हैं कि, जिसके बारे में थोडा जानते हों और थोडा नहीं जानते हों तो वहाँ विवेक वलता हैं। परंतु जिसके बारे में कुछ भी नहीं जानते वहाँ मात्र विश्वास ही चलता हैं, विश्वास में सन्देह नहीं होता ,।
अब यह अलग बात हैं कि,विश्वास करना नहीं करना इसमें सब जे सब स्वतंत्र हैं।


इसको और आसानी से समझने के लिए हम रामजी के कहे शब्दो को देख लें !
मैं अरू मौर तौर तैं माया।। इन बीच किन्हे जीव निकाया।।
ज्ञानी व्यक्ति मैं और मैरा का त्याग करता हैं, और भक्त तू और तैरा को स्वीकार करता हैं। 
भक्त बडॆ़ प्रेम से गाता है। तैरा तुझको अर्पण, क्या लागै मैरा। तो रामनामाकंन कर्ता भक्त तो तैरा तुझको की मान्यता से पदार्थ और क्रिया दोनो को भगवान का ही मानतेहुए भगवान को ही अर्पण करता हैं, और ज्ञानी:- मैं और मैरा को जान कर उसका त्याग करने में लगा रहता हैं। वो संसार से माने हुए संबध का त्याग करने में लगा रहता है। पर भक्त तो भगवान के अलावा किसीसे संबंध मानता ही नहीं, उसका तो आरम्भ से ही तैरा तुझको, का भाव रहता है।, ।
आज का निष्कर्ष तो इतना ही हैं कि, किसी भी चीज का त्याग जरने के बजाय अर्पण करना ज्यादा सरल सहज और आसान होता हैं।