कोविड-19: ‘गवर्नेन्स’ के मुद्दे पर सत्ता का केन्द्रीकरण खतरनाक

कोविड-19: ‘गवर्नेन्स’ के मुद्दे पर सत्ता का केन्द्रीकरण खतरनाक


- उमेश त्रिवेदी
- लेखक सुबह सवेरे के प्रधान संपादक है।

- साभार दैनिक समाचार पत्र सुबह सवेरे 


राहुल गांधी और रघुराम राजन के बीच सम्पन्न ’कोरोना-संवाद’ के विभिन्न मशविरों को महज इसलिए अनदेखा नहीं कर दिया जाना चाहिए कि वह ऐसे दो व्यक्तियों की बातचीत है, जिन्हें मोदी सरकार पसंद नही करती है। राहुल के प्रति मोदी-सरकार की नापसंदगी के लिए किसी खुलासे की जरूरत नही हैं, उसी प्रकार रघुराम राजन को लेकर केन्द्र सरकार की नाराजी के सबब  छिपे नहीं है। मनमोहन सिंह सरकार ने 2013 में रघुराम राजन को भारतीय रिजर्व बैंक का गवर्नर बनाया था। आर्थिक मसलों पर मतभेदो के कारण रघुराम राजन ने गवर्नर पद से इस्तीफा दे दिया था। वर्तमान में राजन यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर हैं।
कोरोना महामारी के बाद अर्थ व्यवस्था से जुड़े सवालों के निदान के रास्ते जानने के लिए राहुल गांधी ने इकॉनामिक्स और हैल्थ के क्षेत्र मे सक्रिय विश्‍व स्तर के विशेषज्ञों से एक सिलसिला शुरू किया है। कोरोना के आर्थिक पहलुओं पर  रघुराम राजन से उनकी एक घंटे लंबी यह बातचीत इस महत्वपूर्ण संवाद श्रृंखला की पहली कड़ी है। उसका यह वीडियो गुरूवार को जारी किया गया है। कोरोना की आपदाओं को सियासी विवादों से बचाने के लिए  विशेषज्ञो से संवाद की वीडियो कांफ्रेंसिंग की इस सीरिज में राहुल गांधी भाजपा के बारे में कोई बात नही करेंगे।
राहुल कुछ भी कहें, लेकिन यह मति भ्रम नहीं होना चाहिए कि कोरोना के मसलों में उनके सवालों से राजनीतिक चिंगारियां नहीं फूटेंगी। ’डायलॉग’ के ’इको-सिस्टम’ में तैरने वाली स्वर लहरियों के सिरे राजनीति के गलियारों में ही खुलते हैं। वैसे भी डायलॉग प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की तासीर का हिस्सा नहीं हैं। मोदी सिर्फ मोनोलॉग में भरोसा करते हैं। हर महीने उनके ’मन की बात’ की प्रस्तुति मोनोलॉग से उनके अमर प्रेम की कहानियों में रंग भरती नजर आती है। इस तारतम्य में मोदी को यह कदापि कबूल नहीं होगा कि विपक्ष का कोई नेता, वह भी राहुल गांधी, दुनिया के जाने-माने विशेषज्ञों से बात करके संकट की इन घड़ियों में राय मशविरा दें। राहुल गांधी इस बात को भली-भांति समझते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी उनके किसी भी परामर्श या पहल को कोई तवज्जो नहीं देंगे। इसीलिए राहुल ने इस पहल का ताना-बाना विशेषज्ञों के ’ओपिनियन’ के इर्द-गिर्द बुना है,  ताकि ’गवर्नेन्स’ की कसौटियों पर मोदी-सरकार को नापने की कोशिश की जाए। फिलवक्त विपक्ष केन्द्र सरकार के सामने किसी किस्म की राजनीतिक चुनौती उपस्थित करने मे समर्थ नही हैं। लेकिन ’गवर्नेन्स’ के सवाल पर मोदी-सरकार कमजोर जमीन पर खड़ी है। राष्ट्रद्रोह की श्रेणी से परे ’गवर्नेन्स’ के सवाल मोदी सरकार को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं। कोरोना महामारी के संघर्ष में भूख-प्यास, बेरोजगारी और मौत के शोक-गीत वीर-रस मे पगे राष्ट्रवाद की गर्जनाओं को टोकते नजर आते हैं।
राहुल गांधी के इस साक्षात्कार में राजन का यह ऑब्जर्वेशन गौरतलब है कि देश मे दूसरे लॉकडाउन का मतलब साफ है कि सरकार स्वास्थ्य और आर्थिक मामलो में कोरोना से निपटने में असफल रही है। गौरतलब है कि रघुराम राजन जिस वक्त दूसरे लॉकडाउन की असफलताओं का आकलन कर रहे हैं, उसी वक्स सरकार ने दो सप्ताह के तीसरे लॉकडाउन का ऐलान कर दिया है। जाहिर है राजन की नजर में हालात बदतर हो रहे हैं। तीसरा लॉकडाउन आम जनता में अविश्‍वास को घनीभूत करेगा। फिर लॉकडाउन के दरम्यान अमेरिका जैसे आत्म-विश्‍वास के साथ आर्थिक गतिविधियों का क्रमवार सिलसिला शुरू करने के लिए देश मे हर दिन न्यूनतम बीस लाख टेस्ट करना पड़ेंगे, जो हमारे लिए असंभव है। वायरस के साथ अर्थव्यवस्था को संभालना बड़ी चुनौती है। सावधानी जरूरी है कि जब हम अर्थ व्यवस्था खोलें, तो यह इस प्रकार हो कि आप बीमारी से उठ पाएं, न कि मौत के सामने खड़े हों...।
राहुल गांधी और रघुराम राजन की बातचीत के अपने मायने हैं। बहुमत के गुरूर में भाजपा इस विमर्श को अनसुना कर सकती है। लोकतंत्र में जन मत की सहमति और सम्मति मायने रखती है। त्रासदी यह है कि सत्ता के केन्द्रीयकरण ने लोकतंत्र में संवाद और सम्मति के प्राणवायु फूंकने वाले अंग ने काम करना बंद कर दिया है। रघुराम राजन कहते हैं कि ’इतिहास गवाह है कि जब कभी भी इस हद तक सत्ता का केन्द्रीकरण हुआ है, सारी व्यवस्थाएं धराशायी हो गई हैं...।’


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