थमती नहीं, *जिंदगी* कभी, किसी के बिना ।। मगर, यह *गुजरती* भी नहीं, अपनों के बिना ।। - श्रीमती संगीता साहू बरझर मध्यप्रदेश


जो कह दिया वह *शब्द* थे ;


जो नहीं कह सके वो *अनुभूति* थी ।।


और, जो कहना है मगर ;


कह नहीं सकते, वो *मर्यादा* है ।।


*जिंदगी* का क्या है ? आ कर *नहाया*,


और, *नहाकर* चल दिए ।। *


बात पर गौर करना*- ---- *


पत्तों* सी होती है कई *रिश्तों की उम्र*,


आज *हरे*-------! कल *सूखे* -------!


क्यों न हम, *जड़ों* से; रिश्ते निभाना सीखें ।।


रिश्तों को निभाने के लिए,


कभी *अंधा*, कभी *गूँगा*,


और कभी *बहरा* ; होना ही पड़ता है ।।


*बरसात* गिरी और *कानों* में इतना कह गई कि---------! *गर्मी* हमेशा किसी की भी नहीं रहती ।।


*नसीहत*, *नर्म लहजे* में ही अच्छी लगती है ।


क्योंकि, *दस्तक का मकसद*,


*दरवाजा* खुलवाना होता है; तोड़ना नहीं ।।


*घमंड*-----------! किसी का भी नहीं रहा,


*टूटने से पहले* , *गुल्लक* को भी लगता है कि ;


*सारे पैसे उसी के हैं* ।


जिस बात पर , कोई *मुस्कुरा* दे;


बात --------! बस वही *खूबसूरत* है ।।


थमती नहीं, *जिंदगी* कभी, किसी के बिना ।।


मगर, यह *गुजरती* भी नहीं, अपनों के बिना ।।


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