1998 से लेकर अभी तक पिछले छ: विधानसभा चुनावों में से केवल 1998 का चुनाव ही कांग्रेस ने जीता था


क्या आगर के भगवा किले को भेद पायेंगे विपिन वानखेड़े अरुण पटेल 


आगर-मालवा जिले का आगर विधानसभा क्षेत्र अनुसूचित जाति के लिए लिए आरक्षित है और यहाँ पिछले चार विधानसभा चुनावों और एक उपचुनाव से भाजपा का मजबूत किला साबित हुआ है। 1998 से लेकर अभी तक पिछले छ: विधानसभा चुनावों में से केवल 1998 का चुनाव ही कांग्रेस ने जीता था। हालांकि 2018 के विधानसभा चुनाव में भाजपा भाजपा के किले की दीवारों को कांग्रेस उम्मीदवार विपिन वानखेड़े ने उस समय हिलाकर रख दिया जबकि वह भाजपा के एक बड़े दलित नेता मनोहर ऊंटवाल के हाथों 2490 मतों से ही पराजित हुए। इसके पूर्व कांग्रेस उम्मीदवार इस क्षेत्र में हुए पांच चुनावों में भारी मतों के अन्तर से पराजित हुए थे। मनोहर ऊंटवाल के निधन के कारण रिक्त हुई सीट पर उपचुनाव हो रहा है और भाजपा ने ऊंटवाल के बेटे मनोज ऊंटवाल को चुनाव मैदान में उतारा है तो कांग्रेस की ओर से फिर से उसके युवा नेता विपिन वानखेड़े चुनौती दे रहे हैं बहुजन समाज पार्टी ने गजेन्द्र बनजारिया को चुनाव मैदान में उतारा है तो सपाक्स ने भी उपचुनाव में उतरने का फैसला किया है और उसने इस क्षेत्र से संतोष रत्नाकर को टिकट थमा दी है। इस में उसका उम्मीदवार क्या कुछ की पायेगाए यह नतीजों से ही पता चलेगा। इस चुनाव में असली दिलचस्पी का विषय यही है कि क्या कांग्रेस के विपिन वानखेड़े इस बार भाजपा के किले में सेंध लगा पायेंगे पायेंगे या नहीं अन्यथा यह तो भाजपा मजबूत गढ़ बन ही चुका हैइस क्षेत्र में अभी तक उपचुनाव को मिलाकर 15 चुनाव हुए हैं जिनमें कांग्रेस को मात्र तीन बार ही जीत का स्वाद चखने को मिला है और 12 चुनावों में भाजपा ने जीत हासिल की। जहां तक भाजपा उम्मीदवार मनोज ऊंटवाल का सवाल है उन्हें उम्मीद है कि एक तो यह भाजपा का मजबूत गढ़ है और दूसरे उनके पिताजी यहां के बड़े नेता रहे हैं इसलिए वह आसानी से चुनाव जीत जायेंगे। लेकिन विपिन विपन वानखेड़े को भी कमजोर प्रत्याशी नहीं माना जा सकता क्योंकि उनके पीछे कांग्रेस की युवा शक्ति पूरी ताकत से लगी हुई हैए यही कारण था कि उन्होंने मनोहर ऊंटवाल को कड़ी टक्कर दी थी।


यह विधानसभा के उन तीन क्षेत्रों में से एक है जहां बिकाऊए टिकाऊ या दलबदलू कोई मुद्दा नहीं है और इन क्षेत्रों में प्रत्याशियों के निधन के कारण उपचुनाव की नौबत आई है। इसलिए यहां विकास तथा 15 साल बनाम 15 माह का कार्यकाल ही मुख्य चुनावी मुद्दा रहने वाला है। बाहरी नेताओं का इस सीट पर बोलबाला रहा हैए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के कार्यकाल में आगर मालवा जिला बना और तबसे भाजपा की पकड़ यहां और मजबूत हुई है। कांग्रेस उम्मीदवारों को केवल 1972ए 1985 और 1998 में ही इस सीट पर जीत दर्ज कराने में सफलता मिल पाई है। जहां भाजपा अपनी सरकार के 15 सालों और बाद के छ: माह से अधिक कार्यकाल की उपलब्धियों को मुख्य मुद्दा बना रही तो साथ ही कांग्रेस की वादाखिलाफी तथा किसानों किसानों की ऋण माफी के वायदे को ना निभाने को भी उठा रही है। वहीं दूसरी ओर 15 माह के कमलनाथ सरकार के कार्यकाल में जो कार्य हुए उनको लेकर भाजपा का किला भेदने के लिए कांग्रेस मैदान में में हैं और कर्जमाफी को वह भुनाने में लगी हुई है। एनएसयूआई की पूरी टीम व युवा कांग्रेस नेता सक्रिय हैं। वानखेड़े व उनकी टीम ने पिछले चुनाव में हुई चूक से सबक लिया है और पुरानी गलतियों को सुधारते हुए भाजपा प्रत्याशी से बहुत पहले ही आगर सीट पर सक्रियता बढ़ा दी। विपिन वानखेड़े एनएसयूआई के भी प्रदेश अध्यक्ष भी भी हैं जहां तक इस क्षेत्र में चुनावी मुद्दों का सवाल है तो सबसे बड़ा मुद्दा बेरोजगारी और रेल सुविधाओं का अभाव है। बड़े उद्योग नहीं होने से बेरोजगारों को रोजगार नहीं मिल रहा है। संतरा उत्पादन में यह इलाका अग्रणी है लेकिन फूड प्रोसेसिंग यूनिट नहीं होने की कमी भी एक मुद्दा है। इस क्षेत्र में एक बड़ा मुद्दा भावान्तरण का भी है। फसलों का प्रीमियम देने के बाद क्लेम ना मिलने से किसानों में नाराजगी हैयहां उम्मीदवार कितने ही हों लेकिन असली चुनावी लड़ाई भाजपा व कांग्रेस के बीच ही होना है। इस सीट पर भाजपा पहले से ही मजबूत है और ज्योतिरादित्य सिंधिया के भाजपा में आ जाने से उसका उसे अतिरिक्त लाभ मिल सकता है। यहां पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह अपने प्रभाव का उपयोग कर नतीजे बदलने की भरपूर कोशिश करेंगे क्योंकि इस क्षेत्र में उनके समर्थक बड़ी तादाद में क्षत्रिय मतदाताओं को एकजुट करने के लिहाज से पूर्व मंत्री व दिग्विजय सिंह के पुत्र जयवर्धन सिंह को उपचुनाव की जिम्मेदारी दी गयी है। जयवर्द्धन ने नगरीय प्रशासन व विकास मंत्री रहते हुए आगर मालवा की नलजल योजना स्वीकृत की थी और कांग्रेस उसे अपने पक्ष में एक मुद्दा बना रही है।


और अन्त में....


भाजपा उम्मीदवार मनोज ऊंटवाल अपने पिता के सपने को पूरा करने की जिम्मेदारी का निवर्हन करने चुनाव मैदान में हैं और उनका कहना है कि उनके पिताजी और उससे पूर्व के सभी भाजपाई विधायकों विधायकों ने क्षेत्र के विकास में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। विकास की की इस गंगा को आगे बढ़ाने के लिए वे पूरा-पूरा प्रयास करेंगेए कांग्रेस पार्टी का काम केवल आरोप लगाना है। वहीं वानखेड़े का आरोप है कि भाजपा सरकार के कार्यकाल में किसानए नौजवान हैरान-परेशान हैए कांग्रेस सरकार ने इस क्षेत्र में 15 महीनों में किसानों कर्ज माफ किया हैए किसानों को बीमा की राशि व मुआवजा दिलवाया तथा 603 करोड़ रुपये की नलजल योजना स्वीकृत कराई है। बाबा बैजनाथ धाम में विकास कार्य के लिए पांच करोड़ की राशि कमलनाथ सरकार ने दी थीथी1998 से लेकर पांच चुनाव और एक उपचुनाव का रुझान देखा जाए तो कांग्रेस की तुलना में यहां भाजपा बहुत मजबूत है। 1998 में कांग्रेस के रामलाल मालवीय ने भाजपा के गोपाल परमार को 15 हजार 17 मतों के अन्तर से हराया और उसके बाद से कांग्रेस  अपनी जीत के लिए तरस रही है। 2003 में भाजपा की रेखा रत्नाकर ने कांग्रेस के रामलाल मालवीय को 24 हजार 916 मतों से हराया2008 में भाजपा के लालजीराम मालवीय ने कांग्रेस के रमेशचन्द्र सूर्यवंशी को 16 हजार 434 मतों से पराजित किया। 2013 में भाजपा के के मनोहर ऊंटवाल ने कांग्रेस के माधव सिंह को 28 हजार 829 मतों के अन्तर से पराजित कर दिया। बाद में वह लोकसभा सदस्य चुन लिए गए और उसके बाद हुए उपचुनाव में भी भाजपा ने ही जीत दर्ज की। 2018 में मनोहर ऊंटवाल ने कांग्रेस के विपिन वानेखेड़े को 24 हजार १० मतों के अन्तर से हराया। अब ऊंटवाल के बेटे मनोज का मुकाबला फिर से कांग्रेस के विपिन वानखेड़े से हो रहा है।


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