कोरोना वायरस की दहशत के बीच सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर रायपुर की सेंट्रल जेल से 96 विचाराधीन बंदियों को शुक्रवार की रात जमानत पर रिहा कर दिया गया.


कोरोना वायरस की दहशत के बीच सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर रायपुर की सेंट्रल जेल से 96 विचाराधीन बंदियों को शुक्रवार की रात जमानत पर रिहा कर दिया गया. माना जा रहा है कि कोरोना वायरस के मद्देनज़र कैदियों को विशेष पैरोल और फर्लो देकर रिहा किये जाने से जेलों में भीड़ कम होगी. राज्य की दूसरी जेलों से भी बंदियों की जल्दी रिहाई होगी. इधर, इस फैसले के बाद राज्य भर की जेलों में बंद आदिवासियों को रिहा करने की मांग फिर से उठने लगी है. राज्य के मंत्री कवासी लखमा के बेटे और माओवाद प्रभावित सुकमा जिला पंचायत के अध्यक्ष कवासी हरीश ने राज्य सरकार को पत्र लिख कर फिर से इन आदिवासियों की रिहाई की मांग की है.


आजीवन कारावास के मामले छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की अधिवक्ता रजनी सोरेन कहती हैं, "राज्य भर की जेलें कैदियों से ठसाठस भरी हुई हैं. अब जबकि राज्य में कोरोना वायरस के मामले सामने आ चुके हैं और सरकार लॉकढ़ाउन व कयूं जैसे रास्ते पर है, तब सरकार को बरसों से जेलों में बंद आदिवासियों की रिहाई की कार्रवाई को लेकर गंभीर होने की ज़रुरत है." यह चार साल पुराना मामला है, जब छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में इस बात पर बहस हो रही थी कि राज्य भर की जेलों में जिन लोगों ने आजीवन कारावास की अपनी सज़ा पूरी कर ली है, उन्हें क़ानूनी प्रावधानों के तहत रिहा कर देना चाहिये.


हाई कोर्ट का आदेश हत्या के एक मामले में आजीवन कारावास की सज़ा काट रहे दंतेवाड़ा के फुलनार गांव के रहने वाले चितू ऊर्फ सीताराम की फ़ाइल से पता चलता है कि जब बिलासपुर हाईकोर्ट में कैदियों की रिहाई पर बहस हो रही थी, वे अपनी जिंदगी के लगभग 20 साल जेल में गुज़ार चुके थे. लेकिन हाईकोर्ट की इस बहस और आदेश के बाद महीनों और साल गुज़र गये. हाईकोर्ट के आदेश पर फ़ाइलें आगे बढ़ती रहीं, टिप्पणियां दर्ज़ होती रहीं. इन फ़ाइलों के साथ ही चित्तू की रिहाई के सपने तार-तार होते गये.


फ़ाइलों में कैद जिंदगी पिछले महीने की 6 तारीख को चित्तू की जेल में ही मौत हो गई. इधर, भारत सरकार के मानवाधिकार आयोग की एक फ़ाइल से पता चलता है कि 3 मार्च को आयोग ने छत्तीसगढ़ के मुख्य सचिव, बस्तर के कलेक्टर, पुलिस अधीक्षक और जेल अधीक्षक से चित्तु की मौत को लेकर रिपोर्ट मांगी है. इस फ़ाइल के अनुसार राज्य सरकार को 26 अप्रैल तक संबंधित रिपोर्ट भेजनी है. एक सरकारी अफ़सर इसे 'रुटिन' की फ़ाइल बताते हैं.


सामाजिक कार्यकर्ताओं में निराशा आजीवन कारावास के कैदियों की रिहाई के मामले में हमने जगदलपुर के प्रथम अपर सत्र न्यायालय की कई फ़ाइलों में यह टिप्पणी देखी, "उल्लेखित दोषसिद्धी दंढ़ित बंदियों को इस न्यायालय के द्वारा दिये गये आजीवन कारावास के दंढ़ादेश का लघुकरण का परिहार के संबंध में इस स्तर को कोई भी अभिमत दिया जाना न्यायोचित प्रतीत नहीं हो रहा है." यानी जिस मामले में क़ानूनन कैदी की रिहाई को लेकर न्यायाधीश से राय मांगी गयी, उन्होंने कमेटी को यह लिख भेज दिया कि इस न्यायालय द्वारा जिस कैदी को आजीवन कारावास की सज़ा दी गई है, उसे कम करने पर कोई राय देना इस स्तर पर न्यायोचित नहीं लग रहा है.


जस्टिस पटनायक कमेटी बस्तर की सामाजिक कार्यकर्ता सोनी सोरी का कहना है कि राज्य में 2018 में सत्ता में आते ही जब भूपेश बघेल की सरकार ने दावा किया था कि एक कमेटी बना कर निर्दोष आदिवासियों की रिहाई की जाएगी तो आदिवासियों ने बहुत उम्मीद पाल रखी थी. लेकिन अब जा कर राज्य भर में आदिवासियों के खिलाफ़ केवल आबकारी यानी शराब से जुड़े 215 फ़र्जी मामलों की ही वापसी हो पाई है. असल में कांग्रेस पार्टी ने सत्ता में आते ही निर्दोष आदिवासियों की रिहाई का वादा किया था. इसके लिये सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त जज एके पटनायक की अध्यक्षता में एक कमेटी भी बनाई गई. इस कमेटी में छत्तीसगढ़ के महाधिवक्ता, गृह विभाग के अपर मुख्य सचिव, आदिम जाति विकास विभाग के सचिव, महानिदेशक जेल, पुलिस महानिदेशक और बस्तर संभाग के कमिश्नर इस समिति के सदस्य बनाये गये थे. लेकिन पूरे साल भर में यह कमेटी आदिवासियों से जुड़े गंभीर मामलों के बजाये केवल आबकारी से जुड़े 313 मामलों की वापसी का निर्णय ले पाई. इनमें से भी अब तक ऐसे 215 मामलों में ही कार्रवाई हो पाई है.



माओवादी बता कर... यहां तक कि इस शनिवार और रविवार को भी गठन के बाद से तीसरी बार आयोजित पटनायक कमेटी की बैठक में भी 197 मामलों पर ही चर्चा की अनुशंसा की गई है. यहां तक कि 7 और 8 मार्च को भी गठन के बाद से तीसरी बार आयोजित पटनायक कमेटी की बैठक में भी 197 मामलों पर ही चर्चा की अनुशंसा की गई है.


सुप्रीम कोर्ट के प्रावधान जेल में बंद आदिवासियों के कई मामलों की पैरवी करने वाली हाईकोर्ट की अधिवक्ता रजनी सोरेन का कहना है कि पटनायक कमेटी जिन मामलों में फैसले ले रही है, उसके लिये सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही जिला स्तर पर प्रावधान रखे हैं. 24 अप्रैल 2015 के अपने एक आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने हर जिले में जिला न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली 'अंढर ट्रायल रिव्यू कमेटी' स्थापित करने और भारतीय दंढ़ संहिता की 1973 की धारा 436 ए के तहत मामलों की समीक्षा के निर्देश दिये थे. 5 फरवरी 2016 के अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने ऐसी रिव्यू कमेटी को हर तीन महीने में बैठक करने के निर्देश जारी किये थे. 6 मई 2016 को सुप्रीम कोर्ट ने जेलों में कैदियों की अधिकता के मद्देनज़र हाईकोर्ट को ऐसे मामलों में स्वतः संज्ञान ले कर कार्रवाई के आदेश जारी किये थे. रजनी सोरेन कहती हैं, "अगर सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार जिलों में गठित कमेटियां ही कार्रवाई कर दें तो आदिवासियों को बहुत सारी मुश्किलों से छुटकारा मिल सकता है."


तीन साल तक की सज़ा बस्तर में आदिवासियों की क़ानूनी सहायता पर काम कर रही शिखा पांढ़ेय का कहना है कि आदिवासियों के मामलों की सुनवाई भर सही समय पर हो जाये और उन्हें पर्याप्त क़ानूनी सहायता मिल जाये तो पटनायक कमेटी की सार्थकता सिद्ध हो जायेगी. लेकिन इस कमेटी के सदस्य और छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के अतिरिक्त महाधिवक्ता विवेक रंजन तिवारी का कहना है कि पटनायक कमेटी ने पिछली बैठक में 313 मामलों को सुलझाया था, जिनमें अधिकांश मामले आबकारी यानी शराब से जुड़े हुये थे. इसके बाद 7-8 मार्च की बैठक में 91 ऐसे मामलों में कमेटी ने अनुशंसा की, जिनमें अधिकतम तीन साल तक की सज़ा का प्रावधान है. इनमें अधिकांश मामले जुआ, आपसी झगड़े और गाली-गलौच के थे. विवेक रंजन तिवारी कहते हैं, "कमेटी की कोशिश है कि वह अधिक से अधिक आदिवासियों को राहत पहुंचा सके. अगली बैठक में ऐसे मामलों पर विचार करने का प्रस्ताव है, जिनमें सात साल तक की सज़ा है. इस कमेटी के फैसलों का दूरगामी परिणाम नज़र आयेगा."


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